जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने मतदाता सूची के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (Special Intensive Revision – SIR) की वर्तमान प्रक्रिया पर कड़ी आपत्ति जताई है। मौलाना मदनी का कहना है कि यह प्रक्रिया अब केवल चुनावी सुधार तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह नागरिकों के संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए एक बड़ा खतरा बनती जा रही है। उन्होंने चिंता जताई कि यदि नागरिकों को बार-बार अपनी नागरिकता साबित करने के लिए मजबूर किया जाएगा, तो यह संविधान की मूल भावना के विरुद्ध होगा।
🔍 SIR कहीं NRC का नया रूप तो नहीं?
मौलाना मदनी ने आशंका व्यक्त की है कि यह एसआईआर (SIR) कहीं एनआरसी (NRC) का ही एक नया स्वरूप न हो। उन्होंने चुनाव आयोग को याद दिलाया कि उनकी जिम्मेदारी निष्पक्ष चुनाव कराना है, न कि नागरिकों की नागरिकता का निर्धारण करना। उन्होंने पश्चिम बंगाल का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां 27 लाख मतदाताओं को संदिग्ध श्रेणी में डालना लोकतंत्र पर एक गहरा धब्बा है, जिसमें मुसलमानों की बड़ी संख्या प्रभावित हो रही है।
🛡️ नागरिकों के लिए एडवाइजरी: सावधानी बरतें और कानूनी मदद लें
मौलाना मदनी ने सभी नागरिकों, विशेषकर मुसलमानों से अपील की है कि वे इस प्रक्रिया के दौरान अत्यधिक जागरूकता बरतें। उन्होंने सलाह दी है कि:
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सभी आवश्यक दस्तावेज व्यवस्थित रखें।
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जल्दबाजी या लापरवाही में कोई भी फॉर्म जमा न करें।
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छोटी तकनीकी त्रुटि भी भविष्य में कानूनी जटिलताओं का कारण बन सकती है। जमीयत ने भरोसा दिलाया है कि उनके कानूनी विशेषज्ञ और कार्यकर्ता देशभर में लोगों को दस्तावेज जांचने और सही फॉर्म भरने में हर संभव सहायता प्रदान करेंगे।
⚖️ सुप्रीम कोर्ट से उम्मीद और जमीयत का संघर्ष
मौलाना मदनी ने कहा कि जब अन्य संस्थाएं न्याय दिलाने में विफल होती हैं, तो सुप्रीम कोर्ट ही अंतिम आशा बचती है। उन्होंने कहा कि असम में एनआरसी के दौरान जमीयत ने लाखों परिवारों की कानूनी लड़ाई लड़कर उन्हें विदेशी घोषित होने से बचाया था। अब भी यदि एसआईआर के नाम पर किसी के मताधिकार को छीना गया, तो जमीयत हर कानूनी मोर्चे पर मजबूती के साथ पीड़ितों के साथ खड़ी रहेगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह लड़ाई केवल एक समुदाय की नहीं, बल्कि संविधान और लोकतंत्र की रक्षा के लिए है।
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