चंडीगढ़: सोनीपत के 28 साल पुराने चर्चित महेंद्र सिंह हत्याकांड में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट ने इस मामले में निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) द्वारा आरोपियों को बरी किए जाने के फैसले को पूरी तरह से बरकरार रखा है। इसके साथ ही अदालत ने इस फैसले के खिलाफ हरियाणा सरकार द्वारा दायर की गई अपील और मूल शिकायतकर्ता की पुनरीक्षण याचिका (Revision Petition) को भी सिरे से खारिज कर दिया। जस्टिस एनएस शेखावत और जस्टिस एचएस ग्रेवाल की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष (Prosecution) आरोपियों के खिलाफ हत्या और आपराधिक साजिश के आरोपों को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा है। विदित हो कि यह मामला 17 अक्टूबर 1998 को सोनीपत के आहुलाना में महेंद्र सिंह की गोली मारकर की गई हत्या से जुड़ा हुआ था।
📋 हाई कोर्ट ने फैसले में बताईं चार बड़ी वजहें: प्रत्यक्षदर्शी की भूमिका से लेकर सेना के आधिकारिक रिकॉर्ड्स ने पलटा पूरा केस
हाई कोर्ट की खंडपीठ ने अपने विस्तृत फैसले में उन चार मुख्य कानूनी वजहों को रेखांकित किया है, जिसके आधार पर आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी किया गया है:
👥 1. प्रत्यक्षदर्शी की गवाही और आचरण पर गंभीर सवाल
अदालत ने माना कि इस पूरे मामले के मुख्य गवाह रमेश कुमार की गवाही कानूनी रूप से पूरी तरह भरोसेमंद नहीं थी। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि शिकायतकर्ता और मुख्य गवाह का व्यवहार घटना के तुरंत बाद सामान्य मानवीय आचरण से मेल नहीं खाता है, जिससे उनकी मौजूदगी पर संदेह पैदा होता है।
🎖️ 2. सेना के आधिकारिक रिकॉर्ड बने मजबूत बचाव
इस केस का सबसे मजबूत टर्निंग पॉइंट सेना के आधिकारिक दस्तावेज साबित हुए। कोर्ट में यह पुख्ता तौर पर साबित हुआ कि घटना के समय चार नामजद आरोपी अपने सैन्य कर्तव्य पर रुड़की स्थित बीईजी सेंटर (BEG Centre) में मौजूद थे। इस मजबूत सबूत के सामने अभियोजन पक्ष का दावा टिक नहीं सका।
🔫 3. हथियार की बरामदगी और जांच प्रक्रिया संदिग्ध
हाई कोर्ट ने जांच एजेंसी की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। कोर्ट ने नोट किया कि वारदात में इस्तेमाल कथित पिस्टल को एक ऐसे स्थान से बरामद दिखाया गया जो सार्वजनिक और आम पहुंच वाला था। इसके अलावा पूरी जांच प्रक्रिया और जब्ती के तरीकों में कई गंभीर कानूनी खामियां पाई गईं।
🗣️ 4. आपराधिक साजिश का आरोप साबित नहीं हुआ
अदालत को जांच रिकॉर्ड में ऐसा कोई भी विश्वसनीय या वैज्ञानिक सबूत नहीं मिला जो यह साबित कर सके कि महेंद्र सिंह की हत्या के लिए आरोपियों के बीच कोई पूर्व योजना (Pre-planning) बनी थी या उनके बीच कोई गुप्त बैठक हुई थी। बिना ठोस सबूत के केवल आरोपों के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
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