अयोध्या: श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में प्रस्तावित मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) की नियुक्ति को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। अखिल भारतीय संत समिति ने मंदिर प्रशासन में नौकरशाही की भूमिका बढ़ाने के प्रयासों का पुरजोर विरोध करते हुए कहा है कि मठ और मंदिर सरकारी अफसरों के बजाय धार्मिक परंपराओं के अनुसार ही संचालित होने चाहिए।
⚖️ ‘दूसरे धर्मों की तर्ज पर हो मंदिरों का संचालन’
संत समिति ने सवाल उठाया है कि यदि मस्जिदों का संचालन वक्फ बोर्ड, गुरुद्वारों का प्रबंधन SGPC और चर्चों का संचालन चर्च काउंसिल करती है, तो फिर केवल हिंदू मंदिरों में ही सरकारी हस्तक्षेप क्यों? संतों का मानना है कि चार लाख से अधिक हिंदू मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त किया जाना चाहिए और उन्हें पूरी तरह से स्वायत्तता मिलनी चाहिए।
📢 ‘मंदिरों को सत्ता का उपनिवेश न बनाया जाए’
अखिल भारतीय संत समिति के राष्ट्रीय सचिव स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने कहा कि यदि किसी मंदिर में अनियमितता होती है, तो दोषियों पर कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन पूरी प्रशासनिक व्यवस्था को नौकरशाहों के अधीन करना उचित नहीं है। वहीं, महंत नृत्यगोपाल दास के जन्मोत्सव के दौरान संतों ने प्रस्ताव पारित कर कहा कि राम मंदिर का संचालन संत परंपरा और श्रद्धालुओं के हाथों में ही रहना चाहिए। संतों ने पीएम मोदी और सीएम योगी से अपील की है कि ट्रस्ट का पुनर्गठन हो, तो उसमें केवल संतों और विश्वसनीय लोगों को स्थान मिले।
🗓️ 11 जुलाई की बैठक पर टिकी निगाहें
सूत्रों के अनुसार, 11 जुलाई को राम मंदिर ट्रस्ट की एक महत्वपूर्ण बैठक प्रस्तावित है। इस बैठक में संगठनात्मक ढांचे में बड़े बदलाव, ट्रस्ट के पुनर्गठन और प्रशासनिक व्यवस्था पर अहम निर्णय लिए जा सकते हैं। बैठक से पहले ही संत समाज द्वारा अपनी आपत्तियां सार्वजनिक किए जाने से अयोध्या के गलियारों में हलचल तेज हो गई है।
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