नई दिल्ली: नीट (NEET) पेपर लीक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एनटीए (NTA) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने साफ कहा है कि इस बेहद संवेदनशील मामले में जवाबदेही तय होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने विशेषज्ञ समिति के अध्यक्ष से तीखे सवाल करते हुए पूछा कि निगरानी के बावजूद पेपर लीक जैसी घटना कैसे घटी? क्या सिफारिशों में कमी थी या निगरानी हुई ही नहीं?
🛡️ “क्षमता व्यक्ति में नहीं, संस्था में होनी चाहिए”
सुनवाई के दौरान जस्टिस नरसिम्हा ने एक बड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि, “हमारी अधिकांश संस्थाओं की समस्या तदर्थवाद (Ad-hocism) है। क्षमता किसी व्यक्ति में नहीं, बल्कि संस्था में होनी चाहिए।” उन्होंने यूपीएससी (UPSC) का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां कभी ऐसी समस्या नहीं रही, एनटीए को यह समझना होगा। कोर्ट ने जोर दिया कि जब तक जिम्मेदारी तय नहीं होगी, तब तक समस्या का समाधान संभव नहीं है।
📋 एनटीए का पक्ष और भविष्य की तैयारी
विशेषज्ञ समिति के प्रमुख डॉ. राधाकृष्णन ने कोर्ट को बताया कि हमने 60 सुझाव दिए थे, जिनमें से अधिकांश लागू हो चुके हैं। उन्होंने आश्वासन दिया कि अगले महीने होने वाली ‘री-नीट’ परीक्षा के लिए सभी सुरक्षा पहलुओं का ध्यान रखा गया है और उच्च स्तर पर इसकी निगरानी की जा रही है। उन्होंने स्वीकार किया कि एनटीए को और अधिक मजबूत बनाने की आवश्यकता है।
📑 सुप्रीम कोर्ट का आदेश: मंत्रालय को देना होगा हलफनामा
सुप्रीम कोर्ट ने एचआरडी मंत्रालय को आदेश दिया है कि वे 2 जुलाई से पहले एक हलफनामा दाखिल करें। इसमें निम्नलिखित बिंदुओं को स्पष्ट करना होगा:
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भविष्य में परीक्षा प्रक्रिया का संचालन कैसे होगा?
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विशेषज्ञ कर्मियों की नियुक्ति और संस्थागत निरंतरता (Institutional Memory) को कैसे सुनिश्चित किया जाएगा?
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एनटीए के पास भौतिक और बौद्धिक संसाधन कैसे उपलब्ध कराए जाएंगे?
कोर्ट ने सरकार की ओर से यह कहे जाने पर कि “प्रधानमंत्री स्वयं इस पर निगरानी रख रहे हैं”, अत्यंत चिंता व्यक्त की और इसे व्यवस्था की विफलता से जोड़कर देखा। अब सभी की निगाहें 2 जुलाई को दाखिल होने वाले हलफनामे और आगामी परीक्षाओं पर टिकी हैं।
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