महाभारत का युद्ध था ‘अमेरिका-ईरान’ जैसा! एमपी में मिले प्राचीन शस्त्रों के सौदागर, 5000 साल पुराने विनाशकारी हथियारों का खुला राज

मध्य प्रदेश

इंदौर: वर्तमान दौर के युद्ध में ईरान और अमेरिका जैसे देश जिस तरह के अस्त्र-शस्त्र और युद्ध प्रणाली का उपयोग आज कर रहे हैं. भारतीय इतिहास में इस तरह की युद्ध प्रणाली और घातक अस्त्र-शास्त्रों का उपयोग महाभारत काल में भी उपयोग होता था. यह दावा महाभारत काल के अस्त्र शस्त्रों के विशेषज्ञ राज बेंद्रे ने किया है. महाभारत युद्ध में उपयोग किए गए अस्त्र शस्त्र का अध्ययन कर उन्हें अपनी कलाकृतियों के जरिए प्रदर्शित किया है.

महाभारत काल के युद्ध से मेल खाते आज के युद्ध के शस्त्र

अर्जुन का गांडीव धनुष हो या अभिमन्यु का चकव्यूह, कौरवों का ध्वज हो या पांडवों की विजय पताका, यह धरोहर है 7500 हजार साल पुरानी महाभारत युद्ध की. युद्ध कला से जो आज के अमेरिका-ईरान युद्ध की प्रणालियों से मेल खाती है. बीते कई सालों से महाभारत काल के अस्त्र-शास्त्र का अध्ययन करने वाले इंदौर के राज बेंद्रे इसी युद्ध कला और कौशल के साथ लगभग 100 तरह के हथियारों से अब आज की युवा पीढ़ी को रूबरू कर रहे हैं.

उनकी कोशिश है कि भारतीय युद्ध प्रणाली प्राचीन दौर में कितनी समृद्ध थी. यह जानकर देश की रक्षा प्रणाली भी भविष्य में विकसित हो सके. इसके लिए उन्होंने महाभारत काल के सभी हथियारों का अध्ययन करने के बाद उनके स्वरूप और संदर्भ का गहन अध्ययन करके बीते 10 महीने में 30 लोगों की टीम की मदद से एक प्राचीन शस्त्र शाला विकसित की है. जो हर किसी देखने वाले महाभारत काल की शस्त्रशाला का अहसास कराती है.

वैज्ञानिक तरीके से लड़ा गया था महाभारत युद्ध

महाभारत के अध्ययन के दौरान राज बेंद्रे को इन हथियारों का उल्लेख मिला था. इसके बाद महाभारत से संबंध ग्रंथ में मिले तथ्यों के आधार पर 75% तक और 25 परसेंट कल्पना पर आधारित 100 से ज्यादा अस्त्र-शस्त्र तैयार किए गए हैं. इनमें 15 तरह के धनुष जिनमें गांडीव, पिनाक, आग्नेय के अलावा, 14 तरह की चक्रव्यूह की रचना और तरह-तरह की तलवार है. उन्होंने कहा महाभारत का युद्ध भी आज की तरह वैज्ञानिक रूप से लड़ा गया था. जिसके 300 तरह के आर्कियोलॉजिकल आधारित प्रमाण मौजूद हैं.

भोपाल उज्जैन और इंदौर में प्रदर्शन

हाल ही में विरासत से विकास की ओर विषय पर आधारित यह प्रदर्शनी भोपाल में आयोजित की गई. जिसे मुख्यमंत्री मोहन यादव ने उज्जैन में लगाने के निर्देश दिए. इसके बाद इंदौर के जानापाव में परशुराम जयंती के अवसर पर यह प्रदर्शनी लगाई गई. अब इसे जल्दी इंदौर में युवाओं के बीच प्रदर्शन के लिए लगाया जाएगा. जिससे कि लोग प्राचीन युद्ध के प्रमाण और प्रणाली को जान सकें.

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