World Homeopathy Day 2026: रांची के ये नामी MBBS और MD डॉक्टर क्यों करते हैं होम्योपैथी से इलाज? जानें इसकी खास वजह

झारखण्ड

रांची: डॉ. सैमुअल हैनिमैन की जयंती को हर वर्ष 10 अप्रैल को विश्व होम्योपैथी दिवस के रूप में मनाया जाता है. इस मौके पर दुनिया भर में होम्योपैथी की सस्ती, सुलभ और ज्यादातर मामलों में दुष्प्रभाव रहित चिकित्सा पद्धति को याद किया जा रहा है.

10 अप्रैल 1755 को जर्मनी में जन्मे डॉ. सैमुअल हैनिमैन शुरू में एलोपैथिक (आधुनिक चिकित्सा) के चिकित्सक थे. इलाज के दौरान उन्होंने आधुनिक चिकित्सा पद्धति में कई कमियां देखीं. इसके बाद उन्होंने एक नई चिकित्सा प्रणाली की खोज शुरू की. 1790 के आसपास मलेरिया के इलाज में इस्तेमाल होने वाली सिनकोना की छाल (जिसमें कुनैन होता है) पर शोध करते हुए उन्होंने खुद छाल का सेवन किया. इसके बाद उन्हें मलेरिया जैसे लक्षण (बुखार, कंपकंपी, जोड़ों में दर्द) महसूस हुए.

इसी अनुभव के आधार पर डॉ. हैनिमैन ने नया सिद्धांत दिया, “जो दवा स्वस्थ व्यक्ति में लक्षण पैदा करती है, वही दवा बीमार व्यक्ति में उन्हीं लक्षणों को ठीक भी कर सकती है.” इसी को “Like Cures Like” (समान समान को ठीक करता है) कहा जाता है, जो आज पूरी होम्योपैथी चिकित्सा का आधार है.

रांची में MBBS-MD डॉक्टर भी करते हैं होम्योपैथी से इलाज

रांची के प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. उमाशंकर वर्मा एक अनोखा उदाहरण हैं. उन्होंने रांची मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल (वर्तमान में RIMS) से 1969 में MBBS और 1978 में MD पूरा किया. इसके अलावा उन्होंने पटना से होम्योपैथी की पढ़ाई भी की.

डॉ. वर्मा कहते हैं, “असाध्य, पुरानी, जटिल और बार-बार होने वाली बीमारियों, बच्चों और बुजुर्गों की बीमारियों में होम्योपैथिक दवाएं बेहतर परिणाम देती हैं. एलोपैथिक दवाएं समय-समय पर बदलती रहती हैं, लेकिन होम्योपैथी की पुरानी दवाएं आज भी उतनी ही प्रभावशाली हैं.” वे आगे कहते हैं कि होम्योपैथी को लेकर कितने भी विवाद हों, यह एक प्रमाणित और रिकॉर्डेड विज्ञान है. आयुष मंत्रालय ने भी इसकी मटेरिया मेडिका प्रकाशित की है.

कोरोना काल में होम्योपैथी ने दिखाया कमाल

डॉ. उमाशंकर वर्मा ने बताया कि कोरोना महामारी के दौरान उन्होंने कई मरीजों की जान होम्योपैथिक दवाओं से बचाई. वे कहते हैं, “ब्रेन हेमरेज, किडनी, लीवर और अन्य जटिल बीमारियों में होम्योपैथी बेहद कारगर साबित होती है. रांची में ही दर्जनों मरीजों की डायलिसिस होम्योपैथी की दवाओं से बंद हो गई, जबकि एलोपैथी में सिर्फ सपोर्टिव ट्रीटमेंट ही उपलब्ध है.”

डॉ. वर्मा इस भ्रांति को भी दूर करते हैं कि होम्योपैथी धीरे-धीरे असर करती है. उनका कहना है, “सही दवा चुन ली जाए तो होम्योपैथी सेकंडों में असर दिखाती है. यह हर किसी को फायदा जरूर पहुंचाती है.”

रांची में धूमधाम से मनाया गया विश्व होम्योपैथी दिवस

रांची में महात्मा सैमुअल हैनिमैन की जयंती विभिन्न स्थानों पर धूमधाम से मनाई गई. डोरंडा स्थित संयुक्त औषधालय और आयुष निदेशालय में विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया. आयुष चिकित्सकों ने डॉ. हैनिमैन के जीवन और स्वास्थ्य क्षेत्र में उनके योगदान को याद किया.

कार्यक्रम में डॉ. साकेत कुमार (जिला चिकित्सा पदाधिकारी, आयुष), डॉ. फजलुस समी (आयुष पदाधिकारी), डॉ. मोना सिंह सहित अन्य चिकित्सक और चिकित्साकर्मी चिकित्सक शामिल रहे. इस अवसर पर सभी ने होम्योपैथी को सुलभ और सुरक्षित चिकित्सा पद्धति के रूप में बढ़ावा देने का संकल्प लिया.

विश्व होम्योपैथी दिवस के मौके पर डॉ. हैनिमैन को श्रद्धांजलि देते हुए यह संदेश दिया जा रहा है कि होम्योपैथी एक पूरक चिकित्सा पद्धति के रूप में कई बीमारियों में प्रभावी भूमिका निभा सकती है.

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