Pitru Paksha 2026 Ashtami: अष्टमी श्राद्ध पर नारियल और तिल के तेल का प्रयोग क्यों है वर्जित? जानें नियम और पूजन विधि

धार्मिक

हिंदू धर्म में पितृ पक्ष की समयावधि पूर्वजों, पितरों और दिवंगत आत्माओं के स्मरण, तर्पण और पिंडदान के लिए अत्यंत पुण्यदायी और अनिवार्य मानी गई है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन 16 दिनों में श्रद्धापूर्वक अपने पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध करने से परिवार पर पितरों की असीम कृपा बरसती है, पितृ दोष शांत होता है और वंश में सुख-समृद्धि व आरोग्य बना रहता है। पितृ पक्ष में प्रत्येक तिथि का अपना विशिष्ट विधान होता है और उसी निश्चित तिथि पर संबंधित पूर्वज का तर्पण किया जाता है।

इसी क्रम में साल 2026 का अष्टमी श्राद्ध 3 अक्टूबर 2026, शनिवार को पूर्ण श्रद्धा व विधि-विधान से संपन्न किया जाएगा। आइए जानते हैं इस पावन दिन के शुभ मुहूर्त, सरल पूजन विधि और उन तीन वर्जित कार्यों के बारे में जिनका ध्यान रखना आवश्यक है।

⏰ अष्टमी श्राद्ध शुभ मुहूर्त 2026: कुतुप, रौहिण और अपराह्न काल का सटीक समय

शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध कर्म हमेशा मध्याह्न और अपराह्न काल में ही संपन्न किए जाने चाहिए:

  • कुतुप मुहूर्त: सुबह 11:54 से दोपहर 12:41 तक (श्राद्ध संकल्प एवं प्रारंभिक पूजन के लिए श्रेष्ठ)

  • रौहिण मुहूर्त: दोपहर 12:41 से दोपहर 01:29 तक (तर्पण एवं आहुति के लिए अनुकूल समय)

  • अपराह्न काल: दोपहर 01:29 से शाम 03:52 तक (ब्राह्मण भोज और संपूर्ण श्राद्ध समाप्ति का काल)

🙏 अष्टमी श्राद्ध की सरल पूजन एवं तर्पण विधि: कुश, काले तिल और पंचबलि का नियम

घर पर सरलता एवं शुद्धता से श्राद्ध संपन्न करने के प्रमुख चरण:

  • प्रारंभिक तैयारी: स्नान के उपरांत स्वच्छ वस्त्र धारण करें और कुश के पवित्र आसन पर पूर्व अथवा दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठें। अपने समीप गंगाजल या शुद्ध जल, काले तिल, जौ, कच्चा गाय का दूध और तुलसी दल रखें।

  • संकल्प और आह्वान: दाएं हाथ में जल, अक्षत, काले तिल और पुष्प लेकर अपने गोत्र तथा पितरों का स्मरण करें और श्रद्धापूर्वक श्राद्ध व तर्पण का संकल्प लें।

  • तिलांजलि एवं तर्पण: दक्षिण दिशा की ओर मुख रखकर दोनों हाथों की अंजलि में जल व काले तिल लेकर अंगूठे के माध्यम से (पितृ तीर्थ से) पितरों को जल अर्पित करें।

  • पंचबलि भोग: भोजन तैयार होने पर सबसे पहले पांच हिस्सों में पंचबलि (गाय, कुत्ता, कौवा, देवादि और चींटी/अतिथि) के निमित्त भोजन का अंश पत्तल या पत्ते पर अलग निकालें।

  • ब्राह्मण भोज एवं दक्षिणा: किसी योग्य, सात्विक ब्राह्मण या जरूरतमंद व्यक्ति को आदरपूर्वक भोजन कराएं और अपने सामर्थ्य अनुसार वस्त्र, दक्षिणा देकर आशीर्वाद प्राप्त करें।

👥 अष्टमी तिथि पर किसका श्राद्ध किया जाता है: किन पूर्वजों के लिए है यह विशेष दिन?

अष्टमी श्राद्ध के अंतर्गत आने वाले परिजनों और विशेष मान्यताओं का विवरण:

  • अष्टमी को देहावसान: यह श्राद्ध उन सभी परिजनों के लिए किया जाता है, जिनका देहावसान वर्ष के किसी भी मास (शुक्ल पक्ष या कृष्ण पक्ष) की अष्टमी तिथि को हुआ हो।

  • कष्ट या गंभीर रोग से मृत्यु: धार्मिक मान्यता के अनुसार, यदि किसी पूर्वज का निधन किसी दीर्घकालीन असाध्य रोग, गंभीर शारीरिक कष्ट के उपरांत हुआ हो या जो जीवनपर्यंत शिव-शक्ति की विशेष उपासना से जुड़े रहे हों, उनके निमित्त भी अष्टमी तिथि पर श्राद्ध करना विशेष फलदायी माना गया है।

  • तिथि विस्मरण पर उपाय: यदि किसी परिजन की मृत्यु की सटीक तिथि याद न हो, तो उनके निमित्त पितृ पक्ष की अंतिम तिथि यानी ‘सर्वपितृ अमावस्या’ के दिन श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण किया जा सकता है।

🚫 अष्टमी तिथि पर भूलकर भी न करें ये 3 काम: ब्रह्मवैवर्त पुराण के कड़े नियम

धार्मिक ग्रंथों और शास्त्रों के अनुसार अष्टमी तिथि पर इन चीजों का त्याग अनिवार्य है:

  • 1. नारियल का सेवन पूर्णतः वर्जित: ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार अष्टमी तिथि को नारियल और श्रीफल का सेवन करने से बुद्धि और विवेक का नाश होता है। अतः इस दिन नारियल या उससे बनी किसी भी खाद्य सामग्री को खाने से बचना चाहिए।

  • 2. तिल के तेल का प्रयोग न करें: इस पावन तिथि पर तिल के तेल का भोजन में सेवन करना अथवा शरीर व बालों पर मालिश के रूप में लगाना शास्त्रों में निषिद्ध बताया गया है।

  • 3. तामसिक भोजन और व्यसनों से दूरी: श्राद्ध के दिन घर में लहसुन, प्याज, मांस, मदिरा और किसी भी प्रकार के तामसिक पदार्थों का प्रवेश व सेवन वर्जित है। पूर्णतः सात्विक आचरण बनाए रखें।

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