मुंबई: हाल ही में शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) को बड़ा झटका देते हुए कई सांसद बागी होकर मुख्यमंत्री एक शिंदे के गुट में शामिल हो गए। इन सांसदों ने अपने पाला बदलने का मुख्य कारण ‘विकास कार्यों के लिए फंड की कमी’ बताया था। लेकिन हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट और केंद्र सरकार के MPLADS पोर्टल के आंकड़े इन दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं।
📉 100 करोड़ का बजट, खर्च महज 13 फीसदी
आंकड़ों के अनुसार, इन छह बागी सांसदों के पास कुल मिलाकर करीब 100 करोड़ रुपये का फंड उपलब्ध था। पिछले दो वित्तीय वर्षों और इस साल की पहली तिमाही में इन्होंने औसतन सिर्फ 13.60 करोड़ रुपये ही खर्च किए हैं।
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संजय दीना पाटिल (मुंबई उत्तर पूर्व): सबसे कम, मात्र 1.07% फंड खर्च किया।
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नागेश पाटिल-अष्टिकर (हिंगोली): सबसे ज्यादा, 26.84% फंड का इस्तेमाल किया।
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भाऊसाहेब वाकचौरे (शिरडी): 137 प्रस्तावों में से सिर्फ 2 काम पूरे हुए।
🚧 अधूरे पड़े विकास कार्य
रिपोर्ट से पता चलता है कि इन सांसदों ने सैंकड़ों विकास कार्यों के प्रस्ताव तो दिए, लेकिन उनमें से ज्यादातर काम या तो शुरू ही नहीं हुए या फिर आधे-अधूरे पड़े हैं। परभणी के सांसद संजय जाधव हों या यवतमाल के संजय देशमुख, अधिकांश विकास कार्य पेंडिंग लिस्ट में दर्ज हैं।
💬 नेताओं का पक्ष और राजनीतिक वार-पलटवार
जहाँ एक ओर सांसदों का कहना है कि पोर्टल पर दिए गए आंकड़े गलत हैं या उनका विश्लेषण समय से पहले किया गया है, वहीं दूसरी ओर शिवसेना (यूबीटी) के सांसद संजय राउत ने इन पर जोरदार हमला बोला है। राउत ने कहा, “आंकड़े स्पष्ट हैं कि ये सांसद फंड खर्च करने में असफल रहे। उन्हें पैसे खर्च करने से किसने रोका था? अब वे किस फंड की वफादारी की बात कर रहे हैं?”
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