मध्य प्रदेश: प्रदेश के सागर और विदिशा जिले से सामने आए तीन अलग-अलग मामलों ने सरकारी अस्पतालों की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। चिकित्सा जगत में संवेदनशीलता का अभाव और कर्मचारियों की लापरवाही ने कई परिवारों की खुशियां छीन ली हैं।
👁️ केस 1: डॉक्टर की चूक से 19 महीने के मासूम ने गंवाई आंखों की रोशनी
सागर की बंडा तहसील में एक 19 महीने के बच्चे विनय को सर्दी-जुकाम के लिए अस्पताल ले जाया गया था। आरोप है कि ड्यूटी पर तैनात शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. हिमांशु वर्मा ने पर्ची पर दवा लिखने के बाद बच्चे की आंखों में नाक में डालने वाली ‘नोजल ड्रॉप’ डाल दी। एम्स भोपाल में हुई जांच में पुष्टि हुई कि इस गलत दवा के कारण मासूम की आंखों की रोशनी हमेशा के लिए चली गई है। मामले की जांच के लिए सीएमएचओ ने तीन सदस्यीय कमेटी गठित की है।
💉 केस 2: नर्स की लापरवाही से गई मरीज की जान
बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज में भर्ती देवेंद्र पाठक को वार्ड में तैनात नर्स शिखा पटले ने कथित तौर पर बिना डॉक्टरी सलाह के ‘हाई-रिस्क’ इंजेक्शन लगा दिया। परिजनों का आरोप है कि इंजेक्शन लगाते समय नर्स कानों में ब्लूटूथ ईयरफोन लगाकर फोन पर बात कर रही थी। इंजेक्शन के बाद मरीज की स्थिति बिगड़ गई और 11 दिन वेंटिलेटर पर रहने के बाद उनकी मौत हो गई। आरोपी नर्स को निलंबित कर दिया गया है।
🥀 केस 3: एंबुलेंस के अभाव में पिता को गोद में उठाना पड़ा बेटे का शव
विदिशा के सिरोंज अस्पताल में एक हृदयविदारक घटना सामने आई, जहाँ सड़क हादसे में जान गंवाने वाले 5 वर्षीय बच्चे के शव को ले जाने के लिए न स्ट्रेचर मिला और न ही एम्बुलेंस। बेबस पिता को अपने मासूम के शव को गोद में उठाकर अस्पताल परिसर में भटकना पड़ा। पोस्टमार्टम के बाद शव को काली पॉलीथिन में लपेटकर देने की घटना ने अस्पताल प्रशासन की अमानवीयता को उजागर कर दिया है।
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