लैंड फॉर जॉब से जुड़े भ्रष्टाचार के मामले में आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव को दिल्ली हाई कोर्ट से झटका लगा है. दिल्ली हाईकोर्ट ने लालू प्रसाद यादव की उस मांग को खारिज कर दिया है, जिसमें लालू प्रसाद यादव ने दर्ज FIR रद्द करने की मांग की गई थी. जस्टिस रविंदर डुडेजा ने कहा याचिका में कोई दम नही है. दाखिल याचिका में कहा गया था कि सीबीआई ने यह केस बिना जरूरी सेंशन के दर्ज किया गया, जो कानूनी रूप से अवैध है.
मामले की सुनवाई के दौरान लालू प्रसाद यादव की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा था कि जांच एजेंसी CBI ने 18 मई 2022 को FIR दर्ज की, जबकि उस समय लालू प्रसाद यादव रेल मंत्री के रूप में अपने आधिकारिक कर्तव्यों का पालन कर रहे थे.
खास बात यह है कि हाई कोर्ट ने पहले मामले में ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था. उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा था.
कोर्ट ने FIR रद्द करने की मांग किया खारिज
यादव का मामला यह था कि CBI FIR दर्ज करने से पहले उनके खिलाफ प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट (PC एक्ट) की धारा 17-A के तहत जरूरी प्रॉसिक्यूशन मंजूरी लेने में नाकाम रही थी.
यह प्रोविजन सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच करने से पहले सरकार से मंजूरी लेना जरूरी बनाता है, जब ऐसे अपराध सरकारी सिफारिशों या उनके काम के दौरान लिए गए फैसलों से जुड़े हों. यह प्रोविजन प्रिवेंशन ऑफ करप्शन (अमेंडमेंट) एक्ट, 2018 के ज़रिए PC एक्ट में डाला गया था.
यह भी बताया गया कि कथित अपराध 2004-2009 के दौरान किए गए थे, लेकिन FIR लगभग 14 साल की देरी के बाद 2022 में ही दर्ज की गई थी.
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कही ये बात
जस्टिस डुडेजा ने आज फैसला सुनाया कि सेक्शन 17A प्रोस्पेक्टिव नेचर का है और चूंकि यह मामला 2004 से 2009 के बीच किए गए अपराधों से जुड़ा है, इसलिए यह मौजूदा मामले पर लागू नहीं होता है.
कोर्ट ने कहा, इस प्रोविजन के तहत पहले से मंजूरी न मिलने से स्पेशल जज द्वारा पास किए गए शुरुआती जांच, FIR का रजिस्ट्रेशन, जांच या कॉग्निजेंस ऑर्डर पर कोई असर नहीं पड़ता है. पिटीशन में कोई दम नहीं होने के कारण इसे खारिज किया जाता है.
जानें क्या है मामला
यह मामला CBI के उन आरोपों से जुड़ा है जिनमें कहा गया है कि 2004 से 2009 के बीच केंद्रीय रेल मंत्री के तौर पर अपने कार्यकाल के दौरान, लालू प्रसाद यादव ने रेलवे में ग्रुप D पदों पर नियुक्तियां करवाईं, बदले में जमीन के टुकड़े अपने परिवार को मामूली कीमतों पर ट्रांसफर किए.
एजेंसी के मुताबिक, कई नौकरी ढूंढने वालों या उनके रिश्तेदारों ने कथित तौर पर पटना और दूसरी जगहों पर यादव के परिवार के सदस्यों और उनसे जुड़ी संस्थाओं को बिना किसी पब्लिक भर्ती प्रक्रिया के, एक लेन-देन के तहत जमीन बेची या गिफ्ट की. यादव परिवार ने इन आरोपों से इनकार किया है और कहा है कि ये राजनीति से प्रेरित हैं.
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