जंतर-मंतर छात्र प्रदर्शन FIR मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट: पुलिस जांच में दखल रोकने के लिए याचिका, CJP प्रमुख पक्षकार

दिल्ली

नई दिल्ली: दिल्ली के जंतर-मंतर पर 20 जुलाई को आयोजित छात्र विरोध-प्रदर्शन के बाद दर्ज की गई प्राथमिकियों (FIRs) की पुलिस जांच में अनावश्यक हस्तक्षेप रोकने की मांग को लेकर सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) में एक रिट याचिका दाखिल की गई है। इस याचिका में केंद्र सरकार, दिल्ली पुलिस आयुक्त और दिल्ली सरकार को स्पष्ट निर्देश देने का अनुरोध किया गया है कि वे प्रदर्शन से जुड़े मामलों की जांच पूरी तरह स्वतंत्र, निष्पक्ष और विधिक प्रावधानों के अनुसार सुनिश्चित करें।

📢 NEET विसंगतियों को लेकर हुआ था ‘संसद चलो’ मार्च, पुलिस ने दर्ज की थीं कई FIRs

उल्लेखनीय है कि 20 जुलाई को ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) द्वारा NEET परीक्षा पत्र लीक और शिक्षा प्रणाली की कथित विसंगतियों के विरोध में ‘संसद चलो’ मार्च का आह्वान किया गया था। प्रदर्शन के दौरान उत्पन्न विधि-व्यवस्था की स्थिति और कथित हिंसा के उपरांत दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शनकारी छात्रों और आयोजकों के विरुद्ध विभिन्न धाराओं में कई आपराधिक मामले (FIRs) दर्ज किए थे।

🤝 सीजेपी और केंद्र के बीच बातचीत: FIRs वापस लेने की सहमति पर उठा सवाल

व्यापक छात्र असंतोष के बीच 3 अगस्त को सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि सक्षम प्राधिकारी जनहित में छात्रों के खिलाफ दर्ज मामलों को समाप्त या वापस ले सकते हैं। देशव्यापी विरोध-प्रदर्शनों को समाप्त कराने हेतु सीजेपी (CJP) प्रतिनिधियों और केंद्र सरकार के मध्य हुई वार्ता के दौरान इन प्राथमिकियों को वापस लेने की सहमति बनी थी, जिसके परिप्रेक्ष्य में अब यह नई रिट याचिका दायर हुई है।

👥 याचिका में अभिजीत दिपके और शैलेंद्र मणि त्रिपाठी को बनाया गया पक्षकार

रामनाथन द्वारा दायर इस रिट याचिका में सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दिपके और अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी को भी औपचारिक रूप से पक्षकार (Respondent) बनाया गया है। ज्ञात हो कि अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने पूर्व में जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारी छात्रों के विरुद्ध कथित पुलिस कार्रवाई और ज्यादतियों को लेकर एक जनहित याचिका दाखिल की थी।

📜 ‘पुलिस अनुसंधान में अनुचित हस्तक्षेप संवैधानिक चिंता का विषय’: याचिका में दलील

याचिकाकर्ता ने शीर्ष अदालत से यह घोषित करने का आग्रह किया है कि कानून-व्यवस्था के संधारण, अपराध अनुसंधान और अभियुक्तों के अभियोजन में पुलिस को विधिक स्वतंत्रता प्राप्त है। याचिका में तर्क दिया गया है कि जब तक पुलिस कानून के प्रतिकूल कार्य न करे, उसके वैधानिक अनुसंधान कार्य में हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए। पुलिस की कथित ज्यादतियों की जांच उचित है, किंतु अंतरिम आदेशों अथवा राजनीतिक समझौतों के माध्यम से नियमित पुलिस जांच को बाधित या नियंत्रित करना संवैधानिक दृष्टि से चिंताजनक है।

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