मजहब से ऊपर इंसानियत! मंदिर की पुजारिन का निधन, हिंदू-मुसलमानों ने मिलकर दिया कंधा और किया अंतिम संस्कार

मध्य प्रदेश

दमोह: जहां वर्चस्व स्थापित करने कई देशों में मारकाट और लड़ाई मची हुई है. ऐसे में दमोह नगर से एक दिल को सुकून देने वाली तस्वीर सामने आई है. यहां पर हिंदू मुस्लिम एकता ने एक बार फिर इंसानियत की मिसाल कायम की है. मामला नगर के पुराना बाजार क्षेत्र का है. यहां पर अति प्राचीन हजारी मंदिर की सेवा करने वाली तारा बाई तिवारी के निधन के बाद हिंदू और मुस्लिम समाज के लोगों ने मिलकर न केवल उन्हें कंधा दिया बल्कि पूरे रीति रिवाज के साथ उनका अंतिम संस्कार भी किया.

सबको स्नेह करती थी तारा बाई
हजारी मंदिर की सेविका ताराबाई पूरे मोहल्ले में बुआ के नाम से प्रसिद्ध थी. अष्टमी के दिन उनका निधन हो गया वह उम्र दराज हो चुकी थी. मोहल्ले की लगभग दो पीढ़िया उन्हीं के सामने पैदा हुईं और बच्चे उनकी गोद में खेले. क्या हिंदू क्या मुसलमान जो भी उनके पास आता वह उसे स्नेह करती, मंदिर से प्रसाद देती और उसे दुलार करती. मोहल्ले के लोग उन्हें अपनी बहन मानते थे. इस नाते वह पूरे मोहल्ले में नई पीढ़ी के लिए बुआ के नाम से मशहूर हो गई.

हिंदू-मुस्लिम ने दिया पुजारिन को कंधा
जब उनके निधन की खबर मोहल्ले में फैली तो न केवल हिंदू बल्कि मोहल्ले की मुस्लिम समाज के लोग भी सामने आए और उन्हें कंधा देकर शमशान तक ले गए. वहां उनका विधि विधान से अंतिम संस्कार करके उन्हें अंतिम विदा दी. बताया जाता है कि इस पूरे मोहल्ले में कुछ परिवार साहू समाज के कुछ परिवार ब्राह्मण समाज के हैं तथा दो पांच परिवार अन्य समाजों के हैं. लगभग 90 फ़ीसदी मुस्लिम बहुल यह पूरा इलाका है. उसके बाद भी ताराबाई सभी की चहेती बुआ बन गई.

ताराबाई के नाती मोनू तिवारी ने बताया कि, “उनकी तबीयत थोड़ी खराब हुई थी. उल्टी होने के बाद उन्हें जब डॉक्टर को दिखाया तो डॉक्टर ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. जब यह समाचार मोहल्ले में मिला तो मुस्लिम समुदाय के लोग साथ आए. उन्होंने साथ में अंतिम संस्कार कराया. हम बरसों से साथ रह रहे हैं और आपसी भाईचारा है. हमारे गांव में हिंदू-मुसलमान जैसी कोई बात नहीं है, सब आपस में मिलजुल कर रहते हैं.”भाईचारे से रहते हैं गांव के लोग
मोहल्ले में ही रहने वाले एक अन्य व्यक्ति मोहसिन खान ने बताया कि, ”हम लोग बरसों से भाईचारे के साथ रह रहे हैं. बुआ की मृत्यु के 1 दिन पहले ही हम मंदिर में लाइट लगाने गए थे.” उन्होंने कहा था अच्छी और तेज रोशनी वाली लाइट लगाना. लेकिन दूसरे ही दिन समाचार मिला कि उनकी मौत हो गई. तब हम सभी लोगों ने मिलकर उनका अंतिम संस्कार किया. इसके पहले उनके बेटे की मृत्यु हुई थी तब भी हम सभी मुस्लिम समाज के लोगों ने मिलकर अंतिम संस्कार किया था.”

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