सांसदों और नीति विशेषज्ञों की मौजूदगी में New Delhi में Caste Census and Deepening of Social Justice पुस्तक का विमोचन

दिल्ली

नई दिल्ली, 12 मार्च 2026 : पुस्तक “जाति जनगणना और सामाजिक न्याय का सुदृढ़ीकरण” का औपचारिक विमोचन नई दिल्ली स्थित कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया के स्पीकर्स हॉल में अखिल भारतीय OBC छात्र संघ (AIOBCSA) के तत्वावधान में किया गया। इस पुस्तक का संपादन AIOBCSA के राष्ट्रीय अध्यक्ष जी. किरण कुमार और डॉ. वाहिनी बिल्लू ने किया है। पुस्तक में जाति जनगणना की आवश्यकता और भारत में सामाजिक न्याय को सुदृढ़ करने में इसकी भूमिका पर नीति-निर्माताओं, शिक्षाविदों, नौकरशाहों, शोधकर्ताओं और छात्रों के विचारों को समाहित किया गया है।

पुस्तक का संयुक्त रूप से विमोचन लोकसभा सांसद मल्लू रवि, राज्यसभा सांसद पी. विल्सन, आर. कृष्णैया और संजय सिंह, OBC अधिकार नेता रत्न सेतुपति, पूर्व सांसद रापोलू आनंद भास्कर, प्रो. सूरज मंडल, प्रो. संदीप यादव तथा अधिवक्ता शशांक रत्नू ने किया। वक्ताओं ने कहा कि भारत में सामाजिक न्याय को सुदृढ़ बनाने के लिए जाति जनगणना अत्यंत आवश्यक है।

पुस्तक में राज्यसभा सांसद पी. विल्सन, प्रोविडेंस कॉलेज (USA) में ग्लोबल स्टडीज़ की प्रोफेसर प्रो. त्रिना विथायथिल, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के राजनीतिक अध्ययन केंद्र के संकाय सदस्य डॉ. अजय गुडावर्ती तथा सेवानिवृत्त IAS अधिकारी टी. चिरंजीवुलु के लेख शामिल हैं। इसके अलावा कई शिक्षाविदों और छात्रों ने जाति जनगणना तथा प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों पर महत्वपूर्ण विश्लेषण प्रस्तुत किए हैं।

पुस्तक में सामाजिक दार्शनिक कांचा इलैया शेफर्ड और राष्ट्रीय BC बौद्धिक मंच के अध्यक्ष अल्ला रामकृष्ण की प्रस्तावनाएँ भी शामिल हैं। उन्होंने लोकतांत्रिक शासन को मजबूत करने और संसाधनों व अवसरों के न्यायसंगत वितरण के लिए व्यापक जाति जनगणना की आवश्यकता पर प्रकाश डाला है।

कार्यक्रम में संपादकों ने कहा कि जाति जनगणना की बढ़ती मांग भारतीय लोकतंत्र को मजबूत करने और सामाजिक न्याय को आगे बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण है। उन्होंने बताया कि जाति आधारित विश्वसनीय आँकड़े साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण, आरक्षण के प्रभावी क्रियान्वयन और हाशिए पर रहे समुदायों की सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को दूर करने में सहायक होंगे। देश भर से आए सांसदों, प्रोफेसरों, शोधार्थियों और छात्रों ने भी जाति आधारित आँकड़ों के महत्व पर अपने विचार व्यक्त किए। प्रतिभागियों ने कहा कि यह पुस्तक जाति जनगणना और सामाजिक न्याय पर चल रही राष्ट्रीय बहस में महत्वपूर्ण बौद्धिक योगदान सिद्ध होगी।

संपादकों ने आशा व्यक्त की कि यह पुस्तक सार्वजनिक विमर्श को अधिक तथ्यपरक बनाएगी और भारत में जाति जनगणना तथा समान प्रतिनिधित्व के लिए चल रहे प्रयासों को मजबूती प्रदान करेगी।

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