न्यायपालिका में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के अनियंत्रित इस्तेमाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक बेहद महत्वपूर्ण और सख्त रुख अपनाया है। ‘एसेल इंफ्राप्रोजेक्ट्स’ दिवाला मामले में सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने NCLT और NCLAT के आदेशों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने पाया कि न्यायाधिकरणों ने फैसले का आधार ऐसे कंटेंट को बनाया जो अस्तित्व में ही नहीं था और जिसे AI द्वारा मनगढ़ंत तरीके से तैयार किया गया था।
⚠️ ‘न्याय के लिए मिथाइल आइसोसाइनेट गैस जैसा है AI का गलत उपयोग’
सुप्रीम कोर्ट ने इस घटना की तुलना ‘मिथाइल आइसोसाइनेट गैस’ के रिसाव से करते हुए कहा कि कानूनी नजीर के तौर पर नकली या AI जनित जानकारी का उपयोग कानून और न्याय व्यवस्था के लिए विनाशकारी है। न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक आराधे की पीठ ने स्पष्ट किया कि AI केवल एक सहायक उपकरण (Tool) हो सकता है, लेकिन किसी भी स्तर पर मानवीय विवेक और अंतिम नियंत्रण का कोई विकल्प नहीं है।
🛡️ BCI को विशेष समिति गठित करने का निर्देश
इस घटना को गंभीरता से लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ‘बार काउंसिल ऑफ इंडिया’ (BCI) को कानूनी प्रैक्टिस और अदालती फैसलों में AI के उपयोग की निगरानी और जांच के लिए एक विशेषज्ञ समिति बनाने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने चेतावनी दी है कि AI तकनीक इंसानी सोच, तर्क और निर्णय लेने की क्षमता का स्थान लेने लगी है, जो कि न्याय प्रक्रिया की निष्पक्षता के लिए एक बड़ा खतरा है।
📄 क्या था पूरा मामला?
यह विवाद ‘जम्मू और कश्मीर बैंक लिमिटेड’ द्वारा ‘एस्सेल इन्फ्राप्रोजेक्ट्स लिमिटेड’ (EIL) के खिलाफ दायर दिवालियापन याचिका से जुड़ा था। ट्रिब्यूनल ने 87.43 करोड़ रुपये की चूक के आधार पर दिवालियापन कार्यवाही को मंजूरी दी थी, जिसे NCLAT ने भी बरकरार रखा था। सुप्रीम कोर्ट ने अब इन दोनों फैसलों को रद्द करते हुए न्यायाधिकरणों को तथ्यों के आधार पर मामले की फिर से सुनवाई करने का आदेश दिया है। अदालत का यह निर्णय भविष्य में कानूनी जगत में AI के उपयोग को लेकर एक नई गाइडलाइन तय करेगा।
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