इलाहाबाद: उत्तर प्रदेश में ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त किए जाने के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की सिंगल बेंच में सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि प्रधानों को प्रशासक के रूप में बने रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने इस प्रक्रिया को डिवीजन बेंच के आदेशों का उल्लंघन और अदालत की अवमानना की श्रेणी में माना है।
📋 सरकार को अंतिम अवसर, 13 जुलाई को अगली सुनवाई
याचिकाकर्ता अरविंद राठौर की याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने राज्य सरकार को अंतिम अवसर के रूप में विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकार ओबीसी आयोग की रिपोर्ट को रिकॉर्ड पर लाए और त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव कराने की समय-सीमा भी स्पष्ट करे। इस मामले की अगली सुनवाई 13 जुलाई को दोपहर 2:00 बजे निर्धारित की गई है।
🔍 पंचायत चुनाव में देरी का कारण
यूपी में पंचायतों का कार्यकाल 26 मई 2026 को समाप्त हो गया है। चुनाव में देरी के प्रमुख कारणों में 12 जून तक मतदाता सूची का प्रकाशित न हो पाना और ओबीसी आरक्षण निर्धारित करने के लिए नए सिरे से पिछड़ा आयोग का गठन शामिल है। सरकार ने इन स्थितियों के मद्देनजर जब तक आयोग की रिपोर्ट नहीं आती, तब तक ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक की जिम्मेदारी सौंप दी थी।
🗳️ याचिका का मुख्य उद्देश्य
याचिका में मांग की गई है कि प्रशासकों को तत्काल प्रभाव से हटाया जाए और त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव की प्रक्रिया शुरू की जाए। सरकार द्वारा नियुक्त प्रशासकों की वैधता को चुनौती देते हुए यह तर्क दिया गया है कि संवैधानिक प्रावधानों के तहत चुनाव समय पर होना अनिवार्य है।
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