1 लाख लोग-तेजस्वी-अखिलेश और उमर साथ… आज शहीद दिवस को इतना बड़ा क्यों मना रहीं ममता बनर्जी, क्या है 32 साल पहले घटी वो घटना?

देश

बिहार की तरह पश्चिम बंगाल में भी राजनीतिक हलचल धीरे-धीरे तेज होती जा रही है. सत्तारुढ़ तृणमूल कांग्रेस लगातार चौथी बार जीत का स्वाद चखने की कवायद में हैं. अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले ही ममता बनर्जी की पार्टी अपने पक्ष में माहौल बनाने में जुट गई है. ममता की पार्टी के लिए 21 जुलाई का दिन बेहद खास है और माना जा रहा है कि इस अहम दिन के साथ ही पार्टी अपनी चुनावी बिगुल बजा सकती है.

ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस का 32वां शहीद दिवस है. अगले साल पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले तृणमूल पार्टी की 21 जुलाई को होने वाली यह आखिरी महारैली है. महारैली में ममता बनर्जी मुख्य वक्ता तो होंगी ही, साथ में भतीजे अभिषेक बनर्जी भी होंगे. इनके अलावा इस महारैली में अन्य राज्यों में मजबूत राज्यस्तरीय दलों के नेता भी शामिल हो सकते हैं.

1 लाख लोगों की जुटेगी भीड़

कहा जा रहा है कि समाजवादी पार्टी से पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव, राष्ट्रीय जनता दल से तेजस्वी यादव और जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस से उमर अब्दुल्ला भी महारैली में शामिल हो सकते हैं. इस अवसर पर धर्मतला में हो रही महारैली में 1 लाख से ज्यादा लोगों के जुटने की उम्मीद है.

पहले ही उत्तर बंगाल से बड़ी संख्या में लोग कोलकाता पहुंच चुके हैं, लेकिन कोर्ट के आदेश के अनुसार, सुबह 9 बजे से 11 बजे तक का समय ऑफिस जाने वालों के लिए रैलियों से मुक्त रखा जाएगा ताकि वे समय पर ऑफिस पहुंच सकें.

रैली से पहले कोर्ट पहुंचा मामला

21 जुलाई यानी तृणमूल कांग्रेस के लिए शहीदी दिवस, यह दिन पार्टी के लिए बेहद खास दिन होता है. अब कोर्ट के एक फैसले के बाद इस बार का आयोजन (शहीद दिवस रैली) बेहद अहम हो गया है. हर साल की तरह इस बार भी तृणमूल कांग्रेस ने कोलकाता के मध्य में स्थित धर्मतला में शहीदी दिवस पर विशाल आयोजन की योजना बनाई थी. लेकिन आयोजन को लेकर मामला कलकत्ता हाईकोर्ट चला गया.

आरोप लगाया गया कि धर्मतला में शहीद दिवस रैली की वजह से आम लोगों को खासी दिक्कतें हो रही हैं. इस पर कोर्ट ने कोलकाता पुलिस को जरूरी कदम उठाने का निर्देश दिया. साथ ही कहा कि यह आयोजन रात 8 बजे तक खत्म हो जाना चाहिए. कोर्ट की ओर से निर्देश दिए जाने के बाद संभावना यही जताई जा रही है कि धर्मतला में आखिरी बार शहीदी दिवस का आयोजन कराया जा रहा है. अगले साल से इसका आयोजन शहीद मीनार, ब्रिगेड परेड ग्राउंड या फिर कहीं और हो सकता है.

ममता ने किया विपक्ष पर वार

आयोजन स्थल को लेकर कोर्ट की टिप्पणी के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने विपक्ष का नाम लिए बगैर आरोप लगाया कि विपक्षी दल तृणमूल कांग्रेस के शहीद दिवस (21 जुलाई) को नाकाम करने की कोशिश कर रहे हैं. धर्मतला तृणमूल कांग्रेस के लिए बेहद खास इसलिए है क्योंकि यहीं पर प्रदर्शन के दौरान पार्टी के कई कार्यकर्ता जमीन पर गिरे और फिर कभी उठ नहीं सके. ममता का कहना है कि यह इलाका रक्तरंजित है, इसीलिए यहां पर शहीद दिवस रैली आयोजित की गई.

फोटो वोटर आईडी कार्ड के लिए प्रदर्शन

आखिर 21 जुलाई को हुआ क्या था और यह दिन ममता तथा उनकी तृणमूल कांग्रेस के लिए जरूरी क्यों है. बात 1993 की है तब तृणमूल कांग्रेस का गठन नहीं हुआ था और ममता बनर्जी कांग्रेस में थीं. ममता तब 38 साल की युवा नेता थीं, और फायर ब्रांड नेता के रूप में उनकी छवि बन गई थी. पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव की सरकार में ममता खेल मंत्री थीं. लेकिन खेल से जुड़ी नीतियों को लेकर राव सरकार से मतभेद के चलते उन्होंने मंत्री पद छोड़ दिया.

हालांकि ममता बंगाल कांग्रेस में बनी हुई थीं और वह प्रदेश युवा कांग्रेस की अध्यक्ष थीं. साल 1991 में पश्चिम बंगाल में हुए चुनाव में कम्युनिस्ट लेफ्ट फ्रंट फिर से बड़ी बहुमत के साथ सत्ता में लौटने में कामयाब रही. ज्योति बसु फिर से मुख्यमंत्री बने. लेकिन यह चुनाव विवादों में रही. विपक्ष ने चुनाव में धोखाधड़ी के गंभीर आरोप लगाए. यही आरोप धीरे-धीरे पूरे बंगाल में आंदोलन का रूप में लेने लग गया.

क्या हुआ था 21 जुलाई 1993 को

विपक्ष की ओर से वोट डालने के लिए वोटर आईडी कार्ड को अनिवार्य किए जाने की मांग उठने लगी थी. तब चुनावों में वोटर्स को फोटो पहचान पत्र जारी नहीं किए जाते थे. ममता समेत विपक्ष फोटो नहीं होने की वजह से चुनाव में धांधली किए जाने का आरोप लगा रहा था. इसी को लेकर 21 जुलाई 1993 की सुबह 10 बजे ममता बनर्जी अपने समर्थकों के साथ प्रदर्शन करते हुए सड़क पर उतरीं. राइटर्स बिल्डिंग तक मार्च करने की योजना थी. सुरक्षा के कड़े इंतजाम थे. भारी मात्रा में पुलिस बल तैनात किए गए थे.

पुलिस फायरिंग के दौरान खुद ममता भी घायल हो गई थीं (FB)

ममता के प्रदर्शन को देखते हुए सत्तारुढ़ सीपीएम नेताओं को डर सता रहा था कि कहीं ये लोग राइटर्स बिल्डिंग पर कब्जा न कर लें. ऐसी आशंका को देखते हुए राज्य के तत्कालीन गृह मंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने प्रदर्शनकारियों पर फायरिंग का आदेश जारी दे दिया. पुलिस ने फायरिंग शुरू कर दी. ऐसे में वहां हालात बहुत बिगड़ गए. फायरिंग की वजह से युवा कांग्रेस के 13 कार्यकर्ता मारे गए जबकि बड़ी संख्या में लोग घायल भी हुए.

फायरिंग के बाद वर्चस्व की जंग

फायरिंग की इस घटना में खुद ममता को भी चोट लगी और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था. इस घटना के बाद बंगाल कांग्रेस के अंदर वर्चस्व को लेकर घमासान शुरू हो गया. मामला इतना बढ़ा कि बागी तेवर वाली ममता ने साल 1997 में कांग्रेस छोड़ दिया. फिर उन्होंने मुकुल रॉय के साथ मिलकर 1 जनवरी 1998 को तृणमूल कांग्रेस पार्टी का गठन किया.

नई पार्टी बनाने के बाद ममता हर साल इस दिन को शहीदी दिवस के रूप में मनाती आई हैं. हालांकि 2011 में पहली बार सत्ता में आने के बाद तृणमूल के लिए यह दिन बेहद अहम हो गया और हर साल इस दिन को बड़े स्तर को मनाया जाता है. खास बात यह है कि 21 जुलाई की फायरिंग में मारे गए कार्यकर्ताओं के सम्मान में कांग्रेस भी शहीद दिवस मनाती है.

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