रावण के भाई का इकलौता मंदिर! 5000 साल पुराना इतिहास और शरीर का सिर्फ एक हिस्सा, जानें इस मंदिर का अनसुना सच

धार्मिक

राजस्थान के शिक्षा एवं पंचायती राज मंत्री मदन दिलावर ने कोटा जिले के ऐतिहासिक कस्बे कैथून में आयोजित होने वाले पारंपरिक विभीषण मेले का भव्य उद्घाटन किया. धुलेंडी के अवसर पर आयोजित इस मेले में आस्था का सैलाब उमड़ा. कैथून में पिछले 45 वर्षों से यह मेला आयोजित किया जा रहा है. मेले की शुरुआत आसपास के मंदिरों से निकलने वाली देव विमान शोभायात्रा के साथ हुई. रावण के भाई विभीषण के इस मंदिर में विधिवत पूजन के बाद सभी देव विमान मेला स्थल पहुंचे, जहां आतिशबाजी के बीच मुख्य अतिथि मदन दिलावर ने हिरण्यकश्यप के पुतले का दहन किया.

खास बात ये है कि ये इकलौता स्थान है जहां होलिका दहन के बाद हिरण्यकश्यप के पुतले का दहन किया जाता है. कहा जाता है कि होलिका जब जल गई तो हिरण्यकश्यप को गुस्सा आ गया और वह प्रह्लाद को मारने के लिए दौड़ा. तब भगवान विष्णु ने हिरण्यकश्यप का वध किया और भक्त प्रह्वलाद की रक्षा की थी. इसलिए यहां पर होलिका दहन के दूसरे दिन हिरण्यकश्यप के पुतले का दहन किया जाता है.

दूसरी खास बात ये है कि ये दुनिया का इकलौता विभीषण मंदिर है. कैथून स्थित यह मंदिर धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है. कहा जाता है कि ये मंदिर करीब 5000 वर्ष पुराना है.

मंदिर से एक पौराणिक कहानी जुड़ी है. कहा जाता है कि भगवान राम के राज्याभिषेक के समय शिवजी ने मृत्युलोक की सैर करने की इच्छा प्रकट की. जिसके बाद विभीषण ने कांवड़ पर बिठाकर भगवान शंकर और हनुमान को सैर कराने की ठानी. इस पर शिवजी ने शर्त रख दी कि जहां भी उनका कांवड़ जमीन को छुएगा, यात्रा वहीं खत्म हो जाएगी. विभीषण शिवजी और हनुमान को लेकर यात्रा पर निकले.

ऐसे हुआ विभीषण मंदिर का निर्माण

कुछ स्थानों के भ्रमण के बाद विभीषण का पैर कैथून कस्बे में धरती पर पड़ गया और यात्रा खत्म हो गई. कांवड़ का अगला सिरा करीब 12 किलोमीटर आगे चौरचौमा में और दूसरा हिस्सा कोटा के रंगबाड़ी इलाके में पड़ा. ऐसे में रंगबाड़ी में भगवान हनुमान और चौरचौमा में शिव शंकर का मंदिर स्थापित किया गया और जहां विभीषण का पैर पड़ा, वहां विभीषण मंदिर का निर्माण करवाया गया.

धड़ के ऊपर का भाग दिखता है

मंदिर में लगी विभीषण की प्रतिमा आकर्षण का केंद्र है. मंदिर में स्थापित प्रतिमा का केवल धड़ से ऊपर का भाग ही दिखता है. मंदिर के वर्तमान स्वरूप का निर्माण 1770-1821 के बीच महाराव उम्मेदसिंह प्रथम ने करवाया था.

मंत्री दिलावर ने विभीषण जी को परम धर्मात्मा बताते हुए कहा कि उन्होंने अधर्म के पथ पर चल रहे अपने भाई रावण का साथ छोड़कर प्रभु श्री राम का साथ दिया. उन्होंने जोर देकर कहा कि मेले हमारी संस्कृति के अभिन्न अंग हैं और समाज में आपसी मेल-जोल बढ़ाते हैं.

What do you feel about this post?

0%
like

Like

0%
love

Love

0%
happy

Happy

0%
haha

Haha

0%
sad

Sad

0%
angry

Angry