खेलों का ‘पावरहाउस’ हरियाणा: 2% आबादी वाले राज्य का देश के 1/3 अंतर्राष्ट्रीय पदकों पर दबदबा

हरियाणा

चंडीगढ़: हरियाणा एक बार फिर यह सिद्ध कर रहा है कि खेल जगत में अभूतपूर्व सफलता केवल विशाल भौगोलिक आकार या अत्यधिक आबादी पर निर्भर नहीं करती, अपितु यह सुदृढ़ इच्छाशक्ति, दूरदर्शी खेल नीति और खिलाड़ियों के अटूट समर्पण से प्राप्त होती है।

भारत की कुल जनसांख्यिकी में मात्र लगभग दो प्रतिशत की हिस्सेदारी रखने वाला हरियाणा वर्षों से अंतर्राष्ट्रीय खेल पटल पर देश का प्रतिनिधित्व करने वाला अग्रणी राज्य बना हुआ है। ओलंपिक, पैरालिंपिक, एशियन गेम्स, राष्ट्रमंडल खेल (CWG) और विश्व चैंपियनशिप जैसी शीर्ष वैश्विक प्रतियोगिताओं में भारत को प्राप्त होने वाले लगभग एक-तिहाई पदकों पर हरियाणा के माटी के लालों की छाप स्पष्ट दिखाई देती है। यही कारण है कि आज हरियाणा को संपूर्ण राष्ट्र में “खेलों का पावरहाउस” कहकर पुकारा जाता है।

🥇 ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों में हरियाणा का परचम: 13 में से 7 स्वर्ण पदक हरियाणा के नाम, भिवानी की बेटियों ने रचा इतिहास

हाल ही में संपन्न हुए ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों में भी हरियाणा के एथलीटों ने अपनी इस खेल प्रतिष्ठा को अक्षुण्ण रखा।

भारत को मिले कुल 39 पदकों में से 11 पदक हरियाणा के खिलाड़ियों ने जीतकर एक बार फिर सिद्ध किया कि देश की खेल उपलब्धियों में इस प्रदेश का योगदान सर्वाधिक है। सबसे गौरवपूर्ण बात यह रही कि भारत को प्राप्त कुल 13 स्वर्ण पदकों में से 7 स्वर्ण पदक अकेले हरियाणा के जांबाज खिलाड़ियों ने जीते। इनमें भी भिवानी जिले की बेटियों ने 5 स्वर्ण पदक अपने नाम करके न केवल प्रदेश, बल्कि पूरे देश का मस्तक गर्व से ऊंचा कर दिया। एक बार फिर लोकगाथा की वही उक्ति चरितार्थ हो गई— “म्हारी छोरियां छोरों से कम सैं के।”

🥊 ‘मिनी क्यूबा’ भिवानी बना देश की मुक्केबाजी की राजधानी, एथलेटिक्स व पैरा खेलों में भी शानदार प्रदर्शन

हरियाणा की स्वर्णिम खेल संस्कृति का सबसे मूर्तिमंत उदाहरण भिवानी जिला है, जिसे वैश्विक मुक्केबाजी वृत्त में “मिनी क्यूबा” के नाम से जाना जाता है।

ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों में भिवानी के मुक्केबाजों—सचिन सिवाच, साक्षी चौधरी ढांडा, प्रीति पंवार, प्रिया घणघस और जैस्मीन लांबोरिया ने स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रचा। हिसार के अंकुश पंघाल ने स्वर्ण तथा नरेंद्र बेरवाल ने रजत पदक हासिल किया। केवल मुक्केबाजी ही नहीं, अपितु एथलेटिक्स और पैरा खेलों में भी झज्जर की शर्मीला ने महिला शॉटपुट (F-57) में स्वर्ण पदक जीता। पानीपत के स्टार भाला फेंक एथलीट नीरज चोपड़ा ने रजत तथा भिवानी के यशवीर व सीमा (डिस्कस थ्रो) ने कांस्य पदक जीतकर देश का मान बढ़ाया।

📊 प्रमुख खेलों को हटाए जाने के बावजूद हरियाणा का स्ट्राइक रेट रहा सर्वोच्च

यद्यपि बर्मिंघम CWG-2022 के 61 पदकों (जिसमें 20 पदक हरियाणा के थे) की तुलना में इस बार कुल पदकों की संख्या कम प्रतीत हो सकती है, किंतु इसका कारण खिलाड़ियों का प्रदर्शन नहीं बल्कि आयोजकों द्वारा कई प्रमुख खेलों को प्रतियोगिता से बाहर किया जाना था।

ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों से कुश्ती, हॉकी, निशानेबाजी, क्रिकेट, बैडमिंटन, टेबल टेनिस और स्क्वैश जैसे प्रमुख खेलों को हटा दिया गया था। केवल कुश्ती में ही वर्ष 2022 में हरियाणा ने 11 पदक जीते थे। इसके अतिरिक्त क्रिकेट में शैफाली वर्मा तथा पुरुष व महिला हॉकी टीमों के पदकों सहित लगभग 14 पदकों के सीधे अवसर समाप्त हो गए थे। इस परिदृश्य के बावजूद 11 पदक जीतना हरियाणवी खिलाड़ियों की अद्भुत खेल क्षमता को दर्शाता है।

💰 “पदक लाओ-इनाम पाओ” की क्रांतिकारी खेल नीति और आर्थिक सुरक्षा का सुरक्षा चक्र

हरियाणा की इस सतत वैश्विक सफलता के नेपथ्य में राज्य सरकार की सुदृढ़ व पारदर्शी खेल नीति का सबसे बड़ा योगदान है।

“पदक लाओ-इनाम पाओ” की नीति ने एथलीटों को आर्थिक निश्चिंतता प्रदान की है:

  • ओलंपिक व पैरालिंपिक: स्वर्ण पदक विजेता को ₹6 करोड़, रजत पर ₹4 करोड़ तथा कांस्य पदक पर ₹2.5 करोड़।

  • एशियाई व पैरा एशियन गेम्स: स्वर्ण पर ₹3 करोड़, रजत पर ₹1.5 करोड़ तथा कांस्य विजेता को ₹75 लाख।

  • राष्ट्रमंडल खेल (CWG): स्वर्ण पदक पर ₹1.5 करोड़, रजत पर ₹75 लाख तथा कांस्य पर ₹50 लाख की नकद पुरस्कार राशि।

  • तैयारी हेतु अग्रिम सहायता: ओलंपिक/पैरालिंपिक क्वालीफाई करते ही ₹5 लाख तथा एशियाई व राष्ट्रमंडल खेलों हेतु क्वालीफाई करने पर ₹2.5 लाख की अग्रिम वित्तीय मदद।

  • मासिक पेंशन व सम्मान: अर्जुन, द्रोणाचार्य व ध्यानचंद पुरस्कार विजेताओं को ₹20,000 प्रतिमाह तथा भीम अवार्डियों को ₹5,000 प्रतिमाह।

🌱 2000 से अधिक खेल नर्सरियों से संवर रहा भविष्य, मिशन ओलंपिक 2036 की तैयारी

हरियाणा अब केवल वर्तमान की सफलताओं तक सीमित न रहकर भविष्य की पौध तैयार करने में जुटा है।

प्रदेश भर में 2,000 से अधिक खेल नर्सरियों का संचालन किया जा रहा है, जहाँ बाल्यकाल से ही प्रतिभावान बच्चों को तराशा जा रहा है। इन खेल नर्सरियों का मुख्य ध्येय वर्ष 2036 के ओलंपिक खेलों में भारत के लिए अधिकतम पदक सुनिश्चित करना है। आधुनिक स्पोर्ट्स साइंस, अंतर्राष्ट्रीय प्रशिक्षकों और विश्वस्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर के माध्यम से नई पीढ़ी को प्रशिक्षित किया जा रहा है।

🏆 “खिलाड़ियों को सरकारी नौकरियां, छात्रवृत्ति और ₹20 लाख का मेडिकल कवरेज”: मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी

“हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के अनुसार, राज्य सरकार ने उत्कृष्ट खिलाड़ियों के लिए 550 नए पद सृजित किए हैं। खेल कोटे के तहत तृतीय श्रेणी की नौकरियों में 3% तथा चतुर्थ श्रेणी में 10% आरक्षण लागू है। अब तक 225 खिलाड़ियों को प्रथम व द्वितीय श्रेणी की राजपत्रित सरकारी नौकरियां प्रदान की जा चुकी हैं। इसके अतिरिक्त, आवासीय अकादमियों में डाइट राशि बढ़ाकर ₹500 प्रतिदिन की गई है, 8-19 वर्ष के खिलाड़ियों को ₹2,000 से ₹3,000 प्रतिमाह छात्रवृत्ति तथा खिलाड़ियों को ₹20 लाख तक का कैशलेस मेडिकल कवरेज दिया जा रहा है। ओलंपिक विजेताओं को गृह जिले में खेल अकादमी हेतु ₹5 करोड़ तक का ऋण 2% ब्याज सब्सिडी पर उपलब्ध कराया जा रहा है।”

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