मुंबई: बालासाहब ठाकरे द्वारा स्थापित शिवसेना आज अपने 60वें स्थापना दिवस पर एक कठिन दौर से गुजर रही है। जिस पार्टी की पहचान कभी बालासाहब की प्रखर आवाज हुआ करती थी, वह आज उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे के दो धड़ों में विभाजित है। स्थापना दिवस के मौके पर दोनों गुट मुंबई में अलग-अलग शक्ति प्रदर्शन कर रहे हैं, जिससे सियासी पारा गरमा गया है।
⚖️ दो गुटों की जंग और उद्धव गुट की चुनौती
एकनाथ शिंदे गुट ने गोरेगांव के नेस्को ग्राउंड में स्थापना दिवस का कार्यक्रम आयोजित किया है, तो वहीं उद्धव ठाकरे गुट सायन में अपना कार्यक्रम मना रहा है। उद्धव गुट के लिए यह समय विशेष चुनौतीपूर्ण है क्योंकि पार्टी के 9 में से 6 सांसदों ने बगावत कर दी है। अब केवल 3 लोकसभा सांसद ही उद्धव ठाकरे के साथ बचे हैं, जिससे पार्टी दूसरी बार टूटने के कगार पर खड़ी नजर आ रही है।
📢 ‘गद्दार’ बनाम ‘निष्ठा’: पोस्टर युद्ध
शिवसेना (यूबीटी) ने बागी सांसदों के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाया है। मुंबई में लगाए गए बैनर-पोस्टर में बागियों को ‘गद्दार’ बताते हुए समर्थकों से कहा गया है- “जो पार्टी छोड़कर जाए, उसे वहीं तोड़ो।” इसके विपरीत, एकनाथ शिंदे गुट ने भी पूरे मुंबई में पोस्टर लगाए हैं, जिनमें बालासाहब ठाकरे और आनंद दिघे की तस्वीरों के साथ खुद को असली शिवसेना साबित करने का प्रयास किया गया है।
📜 शिवसेना के इतिहास में टूट की कड़वी यादें
शिवसेना के 60 साल के सफर में यह पहला बिखराव नहीं है। पार्टी को अतीत में भी कई बड़े झटके लगे हैं:
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1991: छगन भुजबल का पार्टी से अलग होना।
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1999: गणेश नायक का एनसीपी में शामिल होना।
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2004: नारायण राणे का शिवसेना छोड़ना।
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2007: राज ठाकरे द्वारा अलग पार्टी (मनसे) का गठन।
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2022: एकनाथ शिंदे का बगावत कर अलग होना।
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