‘भारत की एकता और प्रगति के लिए समर्पित जीवन’: पीएम मोदी ने किया डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को याद

देश

भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक विशेष लेख के माध्यम से उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। ‘भारत की एकता और प्रगति के लिए समर्पित जीवन’ शीर्षक वाले इस लेख में पीएम मोदी ने डॉ. मुखर्जी को बुद्धिमत्ता, जनसेवा और नैतिक दृढ़ता का संगम बताया।

यहाँ प्रधानमंत्री द्वारा उनके जीवन और राष्ट्र निर्माण में दिए गए योगदान के प्रमुख बिंदु दिए गए हैं:

🇮🇳 भारत की अखंडता और अनुच्छेद 370

प्रधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट किया कि डॉ. मुखर्जी की राजनीतिक विरासत का केंद्र ‘भारत की अखंडता’ और जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे का विरोध था।

  • विभाजन के समय उन्होंने दृढ़ता से यह सुनिश्चित किया कि पश्चिम बंगाल भारत का अभिन्न अंग बना रहे।

  • सुख-सुविधाओं और व्यक्तिगत त्रासदियों (पत्नी और बेटे के निधन) के बावजूद उन्होंने राष्ट्रसेवा का संकल्प नहीं छोड़ा।

“सालों बाद 2019 में अनुच्छेद 370 और 35A को हटाना उनके बलिदान को सबसे उपयुक्त श्रद्धांजलि थी।” – प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

📚 शिक्षा और औद्योगिक क्षेत्र में दूरदर्शी सुधारक

पीएम मोदी ने डॉ. मुखर्जी को एक महान शिक्षाविद और औद्योगिक विकास का प्रणेता बताया:

  • शिक्षा के क्षेत्र में: वे सबसे कम उम्र में कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति बने। उन्होंने वैज्ञानिक शोध, कृषि अध्ययन और शिक्षक प्रशिक्षण को मजबूत किया। उनका मानना था कि शैक्षणिक संस्थानों को केवल ‘क्लर्क’ नहीं, बल्कि राष्ट्र का नेतृत्व करने वाले युवा तैयार करने चाहिए।

  • औद्योगिक विकास: स्वतंत्र भारत के पहले उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में उन्होंने आधुनिक औद्योगिक विकास की नींव रखी। इसमें दामोदर घाटी निगम और सिंदरी उर्वरक संयंत्र प्रमुख थे।

  • आत्मनिर्भरता का सपना: पीएम मोदी ने गर्व के साथ साझा किया कि उनकी सरकार ने दशकों से उपेक्षित उसी सिंदरी उर्वरक संयंत्र को फिर से शुरू किया है।

⚖️ पद से ऊपर सिद्धांतों और जनसेवा को रखा

डॉ. मुखर्जी एक प्रखर लोकतांत्रिक विचारक थे, जिन्होंने हमेशा देशहित को सर्वोपरि रखा:

  • नेहरू मंत्रिमंडल से इस्तीफा: वैचारिक मतभेदों के बावजूद वे राष्ट्र निर्माण के लिए जवाहरलाल नेहरू के मंत्रिमंडल में शामिल हुए। लेकिन जब राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर मतभेद हुए, तो उन्होंने पद त्याग कर सिद्धांतों को चुना।

  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की वकालत: उन्होंने प्रथम संवैधानिक संशोधन का पुरजोर विरोध किया और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंधों को लेकर चेतावनी दी थी—एक चिंता जो बाद में आपातकाल के दौरान सच साबित हुई।

  • मानवीय दृष्टिकोण: 1943 के बंगाल अकाल और 1942 के मेदिनीपुर चक्रवात के दौरान उनके द्वारा किए गए राहत कार्य उनके मानवीय समर्पण को दर्शाते हैं।

🌟 युवाओं के लिए डॉ. मुखर्जी का प्रेरक संदेश

श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए प्रधानमंत्री ने युवाओं के लिए डॉ. मुखर्जी के एक महत्वपूर्ण संदेश का विशेष रूप से उल्लेख किया:

“आप जो भी काम हाथ में लें उसे गंभीरता से, पूरी लगन से और अच्छे से करें, उसे कभी भी अधूरा या अपूर्ण न छोड़ें।”

लेख के अंत में पीएम मोदी ने विश्वास जताया कि डॉ. मुखर्जी को सच्ची श्रद्धांजलि एक मजबूत, एकजुट, आत्मविश्वासी और करुणामय भारत का निर्माण करना है, और देश की युवा पीढ़ी उनके इस दृष्टिकोण को पूरी लगन के साथ आगे बढ़ाएगी।

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