अब देश में उल्लुओं की गिनती की जाएगी. इसकी शुरुआत सबसे पहले पश्चिम बंगाल राज्य से होने जा रही है, जहां ये पहल शुरू की है. इस तरह पश्चिम बंगाल देश का पहला राज्य बन जाएगा, जहां उल्लुओं की गिनती की जाएगी. उल्लुओं की गिनती का काम पश्चिम बंगाल राज्य में अगले महीने से शुरू होने जा रहा है. ये सर्वे बर्ड्स वाचर्स सोसायटी संगठन की अगुआई में किया जा रहा है.
पक्षी प्रेमी संगठन क्षी प्रेमी संगठन बर्ड्स वाचर्स सोसायटी की इस पहल में डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया और राज्य वन विभाग की ओर से भी सहयोग किया जाएगा. ये सर्वे मई तक चलेगा, जिसके जरिए ये पता लगाया जाएगा कि पश्चिम बंगाल में यह कहां-कहां हैं और किस हालत में रह रहे हैं. इस तरह इनके संरक्षण के लिए भी एक रणनीति तय की जा सकती है.
भारत में उल्लुओं की कुल 36 प्रजातियां
भारत में उल्लुओं की कुल 36 प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें से 23 प्रजातियां अकेले पश्चिम बंगाल में मौजूद हैं. ये उल्लू उत्तर में हिमालय के ऊंचे इलाकों से लेकर दक्षिण में सुंदरबन तक फैले हुए हैं. इस सर्वे के दौरान उल्लुओं की तीन प्रमुख प्रजातियों पर खास फोकस किया जाएगा. इनमें ब्राउन फिश आउल, ओरिएंटल बे आउल और यूरेशियन स्कॉप्स आउल शामिल हैं.
ब्राउन फिश आउल आकार में काफी बड़ा होता है, जो अपनी कान की कलगी (ear tufts), चमकीली पीली आँखों और भूरे-धारीदार पंखों से पहचाना जाता है. छलियों और छोटे जलीय जीवों का शिकार करता है. ओरिएंटल बे और यूरेशियन स्कॉप्स उल्लू छोटे होते हैं, जिनके सिर पर छोटे पंखों के गुच्छे (कान जैसे) होते हैं, आँखें पीली होती हैं और पंख धूसर-भूरे रंग के होते हैं जो पेड़ की छाल से मेल खाते हैं.
इस सर्वे के पीछे क्या है मकसद?
इस सर्वे की शुरुआत के पीछे फरक्का क्षेत्र में दुर्लभ ऑस्ट्रेलियन ग्रास उल्लू का मिलना सबसे बड़ी वजह है. सर्वेक्षण का मकसद केवल प्रजातियों की पहचान करना ही नहीं है, बल्कि यह भी समझना है कि तेजी से बढ़ते शहरीकरण और जंगलों के कटाव के कारण उल्लुओं के प्राकृतिक आवास किस तरह प्रभावित हो रहे हैं. शहरों के विस्तार, पेड़ों की कमी और रोशनी व शोर प्रदूषण के चलते कई उल्लू प्रजातियां बेघर होती जा रही हैं.
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