MP शिक्षक भर्ती 2018: हाईकोर्ट की युगलपीठ का बड़ा फैसला, मेरिट वाले उम्मीदवारों को मनपसंद विभाग में पोस्टिंग देने का आदेश

मध्य प्रदेश

जबलपुर (मध्य प्रदेश): मध्य प्रदेश के स्कूल शिक्षा विभाग और जनजातीय कार्य (आदिवासी कल्याण) विभाग में शिक्षक पदों पर संयुक्त भर्ती प्रक्रिया को लेकर हाईकोर्ट की युगलपीठ ने एक बेहद अहम और दूरगामी फैसला सुनाया है।

हाईकोर्ट जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस बी. पी. शर्मा की युगलपीठ ने मामले में पूर्व में एकलपीठ द्वारा पारित निर्णय को पूरी तरह निरस्त कर दिया है। युगलपीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि प्रशासनिक कारणों की वजह से मेरिट में ऊपर आने वाले योग्य उम्मीदवारों को कम अंक प्राप्त करने वाले अभ्यर्थियों की तुलना में नुकसान नहीं होना चाहिए।

📌 2 महीने में स्कूल चॉइस फिलिंग के आधार पर पोस्टिंग एडजस्ट करने का निर्देश

युगलपीठ द्वारा दिए गए प्रमुख दिशा-निर्देश:

  • मेरिट के आधार पर पोस्टिंग: अदालत ने आदेश दिया कि मेरिट सूची में उच्च स्थान पाने वाले अपीलकर्ताओं को उनकी पसंद (Priority/Choice) के अनुसार पोस्टिंग देने पर गंभीरता से विचार किया जाए।

  • रिक्तियों के आधार पर समायोजन: संबंधित विभाग में उपलब्ध रिक्त पदों (Vacancies) के आधार पर उम्मीदवारों को तुरंत समायोजित किया जाए।

  • 2 महीने की समयसीमा: यदि संबंधित विभाग में तत्काल पद उपलब्ध नहीं हैं, तो आगामी 2 महीने के भीतर स्कूल चॉइस फिलिंग पॉलिसी के तहत उन्हें दूसरे विभाग में अनिवार्य रूप से एडजस्ट किया जाए।

📄 क्या था पूरा मामला? संयुक्त विज्ञापन और काउंसलिंग से वंचित करने का विवाद

शिक्षक पात्रता परीक्षा 2018 से जुड़े विवाद की पृष्ठभूमि:

  • साझा चयन प्रक्रिया: प्रोफेशनल एग्जामिनेशन बोर्ड (PEB) ने दोनों विभागों में शिक्षक पदों के लिए साझा विज्ञापन जारी किया था, जिसमें मेरिट और काउंसलिंग के विकल्पों के आधार पर स्कूल आवंटन होना था।

  • आरक्षित वर्ग के मेरिटोरियस छात्रों की उपेक्षा: आरक्षित वर्ग के कई उम्मीदवारों ने अनारक्षित वर्ग के कट-ऑफ से अधिक अंक प्राप्त किए थे, जिसके चलते उन्हें मेरिट पर सामान्य पदों के विरुद्ध चुना गया। हालांकि, उन्हें आदिवासी कल्याण विभाग के स्कूल आवंटित कर दिए गए।

  • कम अंक वालों को मनचाहा विभाग: उच्च अंक पाने वाले अभ्यर्थियों की पहली प्राथमिकता स्कूल शिक्षा विभाग थी, लेकिन उनसे कम अंक प्राप्त करने वाले उम्मीदवारों को स्कूल शिक्षा विभाग आवंटित कर दिया गया।

  • काउंसलिंग पर रोक के आदेश: इसके बाद 02 नवंबर 2022 और 21 दिसंबर 2022 को आदेश जारी कर आदिवासी कल्याण विभाग में नियुक्ति पा चुके शिक्षकों को स्कूल शिक्षा विभाग की अगली काउंसलिंग से बाहर कर दिया गया।

🏛️ संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन: याचिकाकर्ताओं का तर्क

अपीलकर्ता रामनाथ शाह एवं अन्य की ओर से रखे गए मुख्य बिंदु:

  • मूल विज्ञापन में शर्त का अभाव: अपीलकर्ताओं ने दलील दी कि भर्ती के मूल विज्ञापन में ऐसी कोई शर्त नहीं थी कि एक विभाग में चयन के बाद उम्मीदवार को अपनी उच्च मेरिट के आधार पर दूसरे विभाग की काउंसलिंग से रोका जाएगा।

  • मेरिट के सिद्धांतों की अनदेखी: कम अंक वाले अभ्यर्थी स्कूल शिक्षा विभाग में पदस्थ हो गए, जबकि अधिक अंक वाले वंचित रह गए, जो कि संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 16 (अवसर की समानता) का सीधा उल्लंघन है।

🛡️ सरकार की दलील और हाईकोर्ट की युगलपीठ का कड़ा रुख

अदालत में हुई बहस और अंतिम निष्कर्ष:

  • सरकार का पक्ष: शासन की तरफ से तर्क दिया गया था कि नियुक्ति प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और दोबारा अवसर देने से आदिवासी कल्याण विभाग के पहले से भरे पद फिर से रिक्त हो जाएंगे।

  • कोर्ट की दो-टूक टिप्पणी: युगलपीठ ने रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए कहा कि ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह अस्वीकार्य है जिसके परिणाम स्वरूप अधिक योग्य उम्मीदवार को कम योग्य उम्मीदवार की तुलना में निचले पायदान पर रहना पड़े। इसके साथ ही एकलपीठ का पुराना आदेश निरस्त करते हुए अभ्यर्थियों के पक्ष में राहत जारी की गई।

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