समीक्षा: मनोज बाजपेयी असीमित प्रतिभा के धनी अभिनेता हैं। उनकी हालिया फिल्म ‘गवर्नर’ में उन्होंने आरबीआई के पूर्व गवर्नर एस. वेंकटरमणन पर आधारित ‘ए. रामानन’ का किरदार निभाया है। फिल्म 1990-91 के उस दौर की याद दिलाती है, जब भारत आर्थिक कंगाली और वैश्विक तेल संकट से जूझ रहा था। फिल्म का डॉक्यूमेंटेशन और फाइनेंशियल थ्रिलर के रूप में प्रस्तुति बेहद सराहनीय है, लेकिन क्या मनोज बाजपेयी अपनी अभिनय छवि से बाहर निकल पा रहे हैं?
📈 1991 का आर्थिक इतिहास और फिल्म
यह फिल्म उस दौर को विस्तार से दिखाती है जब भारत का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग खत्म हो चुका था और देश को सोना गिरवी रखकर लोन लेना पड़ा था। डायरेक्टर चिन्मय डी. मंडलेकर की टीम ने इस ऐतिहासिक घटनाक्रम को जिस गंभीरता से पेश किया है, वह दर्शकों को बांधे रखता है। ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ में जो पहलू गौण था, ‘गवर्नर’ उसे ही मुख्य कहानी बनाकर सामने लाती है।
⚖️ क्या मनोज बाजपेयी के किरदार एक जैसे हो गए हैं?
मनोज बाजपेयी के प्रशंसक अक्सर यह सवाल उठाते हैं कि ‘सिर्फ एक बंदा काफी है’ के वकील पीसी सोलंकी हों या ‘गवर्नर’ के रामानन—दोनों किरदारों के हाव-भाव और मिजाज में एक अजीब सी समानता (मोनोटोनस) दिखती है। हालांकि, उनका अभिनय हमेशा की तरह उम्दा है, लेकिन उनकी प्रचलित छवि (जुझारू वकील, निर्भीक पुलिस अधिकारी) के आगे यह किरदार थोड़े सीमित दायरे के लगते हैं।
🌟 इमेज बदलने की कोशिश
मनोज बाजपेयी ने हाल ही में इच्छा जताई है कि वे मसाला फिल्मों में काम करना चाहते हैं, जहाँ वे नाच-गा सकें और कॉमेडी कर सकें। ‘द फैमिली मैन’ के बाद से उनकी लोकप्रियता में जबरदस्त उछाल आया है और उन्होंने साबित किया है कि वे विविधतापूर्ण भूमिकाओं में ढलने में सक्षम हैं। शेखर सुमन के शो में यश चोपड़ा के साथ हुए वाकये को याद करना यह दिखाता है कि एक कलाकार के रूप में उनकी महत्वाकांक्षाएँ अभी और बढ़ी हैं।
🎬 निष्कर्ष
‘गवर्नर’ एक लो-बजट फिल्म होने के बावजूद भारतीय आर्थिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। मनोज बाजपेयी का कूल और गंभीर अभिनय फिल्म की रीढ़ है। निश्चित रूप से, यदि मनोज बाजपेयी अपनी पुलिस और वकील वाली छवि से बाहर निकलकर किसी हल्के-फुल्के या अलग मिजाज के किरदार को चुनते हैं, तो उनके प्रशंसक उन्हें ‘भीखू मात्रे’ की तरह ही एक नए अवतार में भी उतना ही प्यार देंगे।
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