धार भोजशाला में मां सरस्वती का मंदिर, मुस्लिम पक्ष के लिए अलग जमीन… जानें हाई कोर्ट के फैसले में क्या-क्या खास

मध्य प्रदेश

मध्य प्रदेश के सबसे संवेदनशील और ऐतिहासिक धार भोजशाला विवाद पर उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने शुक्रवार को ‘महा-फैसला’ सुना दिया। जस्टिस विजय शुक्ला की सिंगल बेंच ने याचिकाओं पर अंतिम आदेश सुनाते हुए यह साफ कर दिया है कि भोजशाला भवन का धार्मिक चरित्र ‘मां वाग्देवी सरस्वती जी’ के मंदिर का है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर 6 अप्रैल 2026 से इस मामले की लगातार सुनवाई चल रही थी। कोर्ट ने विधिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पक्षों का गहन परीक्षण करने के बाद यह महत्वपूर्ण ऑर्डर पास किया है।

🛡️ सरकार का पक्ष और शांति की अपील: “यह जीत-हार नहीं, न्याय और सौहार्द का फैसला है”

महाधिवक्ता कार्यालय के माध्यम से कोर्ट में सरकार का पक्ष बेहद मजबूती से रखा गया। महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने कहा कि राज्य सरकार इस फैसले को किसी की ‘जीत या हार’ के चश्मे से नहीं देखती। उन्होंने कहा कि सालों से वहां भारी पुलिस फोर्स तैनात करनी पड़ती थी और तनाव के कारण पहले कई दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं भी हुईं। अब इस स्पष्ट निर्णय के बाद प्रदेश में शांति, सामाजिक समरसता और सौहार्द का माहौल मजबूत होगा।

🔍 ASI सर्वे रिपोर्ट की मुख्य फाइंडिंग्स: मूर्तियों और शिलालेखों ने तय किया धार्मिक स्वरूप

उच्च न्यायालय का यह फैसला आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ASI) की वैज्ञानिक रिपोर्ट पर आधारित है। सर्वे के दौरान परिसर के अंदर भगवान विष्णु सहित विभिन्न देवी-देवताओं की प्राचीन मूर्तियां, अष्टकमल की आकृतियां और प्राकृत-संस्कृत भाषा में लिखे दुर्लभ शिलालेख मिले थे। इन साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद न्यायालय ने माना कि भोजशाला भवन ‘Ancient Monuments Preservation Act, 1958’ के तहत संरक्षित है और इसका मूल चरित्र मंदिर का ही है।

📍 फैसले के प्रमुख बिंदु: लंदन से मूर्ति वापसी और अन्य व्यवस्थाएं

  • वाग्देवी का मंदिर: हाई कोर्ट ने स्पष्ट तौर पर माना कि ऐतिहासिक भोजशाला का धार्मिक स्वरूप मां वाग्देवी सरस्वती का मंदिर है।

  • संरक्षित स्मारक: कोर्ट ने कहा कि यह 1904 से एक संरक्षित पुरातात्विक स्मारक है।

  • लंदन से प्रतिमा वापसी: लंदन के म्यूजियम में रखी मां वाग्देवी की मूल प्रतिमा को वापस लाने की मांग पर कोर्ट ने कहा कि यह मामला केंद्र सरकार के पास विचाराधीन है और वे कानून के मुताबिक फैसला लेंगे।

  • भूमि आवंटन का विकल्प: कोर्ट ने दूसरे पक्ष के लिए व्यवस्था दी है कि यदि वे अपनी धार्मिक मान्यताओं के लिए किसी भवन का निर्माण करना चाहते हैं, तो राज्य सरकार को आवेदन दे सकते हैं, जिस पर विधिसम्मत निर्णय लिया जाएगा।

📜 संवैधानिक अधिकार और भविष्य की राह: सुप्रीम कोर्ट में भी मजबूती से पक्ष रखेगी सरकार

राज्य शासन ने साफ कर दिया है कि संविधान के तहत किसी भी पक्ष को ऊपरी अदालत में चुनौती देने का अधिकार है। यदि कोई भी पक्षकार इस फैसले के खिलाफ माननीय सर्वोच्च न्यायालय जाता है, तो मध्य प्रदेश सरकार वहां भी पूरी विधिक सहायता और मजबूती के साथ अपना पक्ष रखेगी। फिलहाल, हाई कोर्ट के विस्तृत लिखित आदेश के अपलोड होने का इंतजार है, जिसके बाद हर एक कानूनी पहलू की बारीकी से समीक्षा की जाएगी। यह फैसला धार सहित पूरे प्रदेश में विकास और शांति के नए युग की शुरुआत माना जा रहा है।

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