रांची: राजधानी रांची स्थित लोकभवन परिसर का भव्य उद्यान इन दिनों लोगों के बीच खास पहचान बना चुका है. प्रतिदिन बड़ी संख्या में सैलानी यहां पहुंच रहे हैं और प्राकृतिक सौंदर्य के साथ ऐतिहासिक विरासत से रूबरू हो रहे हैं. शांत वातावरण, सुसज्जित पथ और हरे-भरे लॉन के बीच स्थित मूर्ति उद्यान इस पूरे परिसर का प्रमुख आकर्षण बनकर उभरा है.
मूर्ति उद्यान का विशेष महत्व इसलिए भी है क्योंकि इसकी परिकल्पना राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अपने राज्यपाल कार्यकाल के दौरान की थी. उनका विचार था कि लोक भवन परिसर में ऐसा स्थल विकसित किया जाए, जहां झारखंड के स्वतंत्रता सेनानियों और लोक नायकों के योगदान को स्थायी रूप से संरक्षित किया जा सके. इसी सोच को मूर्त रूप देते हुए इस उद्यान को आकार दिया गया.
52 एकड़ में फैला लोक भवन उद्यान
झारखंड के लोक भवन परिसर में स्थित यह उद्यान लगभग 52 एकड़ के विशाल क्षेत्र में फैला हुआ है. इतने बड़े क्षेत्र में फैले इस परिसर में प्रकृति और संरचना का संतुलित समन्वय देखने को मिलता है. उद्यान के भीतर बनाए गए पाथवे, खुले लॉन और सुसज्जित हरियाली लोगों को शहर के शोर-शराबे से दूर एक शांत अनुभव प्रदान करते हैं. यहां केवल सैर-सपाटा ही नहीं, बल्कि जानकारीपरक बोर्डों के माध्यम से आगंतुकों को झारखंड के इतिहास और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी जानकारियां भी मिलती हैं.
स्वतंत्रता सेनानियों की गाथाओं से सजा मूर्ति उद्यान
लोक भवन उद्यान परिसर में स्थित मूर्ति उद्यान झारखंड के स्वतंत्रता संग्राम और जनआंदोलनों की जीवंत झलक प्रस्तुत करता है. यहां वीर बुधु भगत की वीरता और बलिदान को विशेष स्थान दिया गया है, जिन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ संगठित जनसंघर्ष का नेतृत्व किया. इसके साथ ही सिदो-कान्हू, जिन्होंने संथाल हूल के माध्यम से ब्रिटिश सत्ता को खुली चुनौती दी, बिरसा मुंडा, जिनका ‘उलगुलान’ आंदोलन आदिवासी चेतना का प्रतीक बना, तिलका मांझी, जिन्हें ब्रिटिश शासन के खिलाफ पहले सशस्त्र विद्रोहों में अग्रणी माना जाता है, और फूलो-झानो, जिन्होंने महिला नेतृत्व को आंदोलन की मुख्यधारा में स्थापित किया. इन सभी लोकनायकों की गाथाएं मूर्तियों और विवरण पट्टों के माध्यम से प्रस्तुत की गई हैं.
हर मूर्ति के साथ उनके संघर्ष, योगदान और ऐतिहासिक भूमिका का संक्षिप्त लेकिन प्रभावशाली विवरण अंकित है, जिससे आगंतुक खासकर युवा वर्ग इतिहास को करीब से समझ पा रहा है.
पर्यटन और चेतना का केंद्र
लोकभवन उद्यान और उसका मूर्ति परिसर अब केवल एक दर्शनीय स्थल भर नहीं रह गया है. यह जगह झारखंड की पहचान, उसकी संघर्षगाथा और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक बनती जा रही है. यहां आने वाले लोग प्रकृति की सुंदरता के साथ-साथ अपने इतिहास से जुड़ाव महसूस कर रहे हैं.
What do you feel about this post?
Like
Love
Happy
Haha
Sad
