खैरागढ़-छुईखदान-गंडई जिले के छुईखदान सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली और मानवीय संवेदनाओं पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। यहाँ पोस्टमॉर्टम के बाद एक मृतक के परिजनों को सरकारी शव वाहन (मुक्तांजलि) नसीब नहीं हुआ, जिसके चलते उन्हें मजबूरी में अपने प्रियजन के शव को एक मालवाहक वाहन में ले जाना पड़ा।
🏠 क्या है पूरा मामला?
ग्राम भुरसूली निवासी 50 वर्षीय जेलेब गोड की छत से गिरने के कारण मौत हो गई थी। पोस्टमॉर्टम की प्रक्रिया के बाद परिजनों को उम्मीद थी कि सरकार की मुक्तांजलि सेवा के तहत उन्हें शव वाहन मिलेगा। लेकिन घंटों इंतजार के बावजूद जब कोई व्यवस्था नहीं हुई, तो परिवार ने अपने दुख और बेबसी के बीच एक मालवाहक गाड़ी का इंतजाम कर शव को गांव पहुँचाया।
📉 बार-बार दोहरा रही शर्मनाक घटनाएं
जिले में यह कोई पहली बार नहीं है जब शव को ऐसी स्थिति में ले जाया गया हो। इससे पहले झूरानदी दोहरे हत्याकांड और मोगरा के एक मासूम बच्चे की मौत के मामलों में भी परिजनों को इसी तरह की अव्यवस्था का सामना करना पड़ा था। हर बार प्रशासनिक स्तर पर जांच और सुधार के दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत जस की तस बनी हुई है।
🗣️ प्रशासन की सफाई और हकीकत
इस मामले में CMHO डॉ. आशीष शर्मा का कहना है कि खैरागढ़ से वाहन भेजा जा रहा था, लेकिन वाहन के पहुँचने से पहले ही परिजनों ने समय बचाने के लिए निजी वाहन का उपयोग किया। हालांकि, स्थानीय निवासियों का आरोप है कि इतने बड़े अस्पताल में एक सरकारी वाहन की कमी व्यवस्था की विफलता को दर्शाती है।
❓ संवेदनशीलता या सिर्फ औपचारिकता?
सरकारी योजनाओं के बड़े-बड़े दावों के बीच, शोक में डूबे परिवारों को शव ढोने के लिए मालवाहक वाहनों का सहारा लेना पड़ रहा है। यह प्रशासनिक लापरवाही ही नहीं, बल्कि व्यवस्था की संवेदनशीलता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है। जनता का सवाल है कि क्या मुक्तांजलि सेवा केवल कागजों तक ही सीमित है?
संपादकीय टिप्पणी: अंतिम संस्कार के समय परिजनों को ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ना अत्यंत पीड़ादायक है। क्या जिला प्रशासन को हर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में एक स्थायी शव वाहन की उपलब्धता सुनिश्चित नहीं करनी चाहिए? अपने विचार नीचे कमेंट्स में साझा करें।
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