धार्मिक डेस्क: आज ज्येष्ठ अधिकमास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि है, जो ‘कालाष्टमी’ के रूप में मनाई जा रही है। यह व्रत भगवान शिव के रौद्र रूप ‘काल भैरव’ को समर्पित है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कालाष्टमी का व्रत रखने और विधि-विधान से काल भैरव की आराधना करने से भक्तों को जीवन के सभी संकटों, शत्रुओं के भय और नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति मिलती है। यह व्रत तीन साल में एक बार आने वाले अधिकमास में पड़ रहा है, इसलिए इसका आध्यात्मिक महत्व और भी बढ़ गया है।
⏳ कालाष्टमी पूजा शुभ मुहूर्त
काल भैरव देव जी की पूजा प्रदोष काल में करना अत्यंत शुभ माना जाता है। पंचांग के अनुसार:
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प्रदोष काल समय: शाम 06:30 बजे से शाम 07:30 बजे तक।
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पूजा का समय: श्रद्धालुओं के पास पूजा-अर्चना के लिए कुल 01 घंटे का विशेष समय रहेगा।
🪔 कालाष्टमी की सरल पूजा विधि
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संकल्प: प्रातःकाल स्नान-ध्यान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें।
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मूर्ति स्थापना: प्रदोष काल में भगवान काल भैरव की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
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सामग्री: भगवान को पुष्प चढ़ाएं, तिलक लगाएं और सरसों के तेल का दीपक जलाएं।
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भोग: काल भैरव को सरसों का तेल, काले तिल, नारियल, लड्डू, मीठा पान, काले चने, दही-बड़ा, हलवा और खीर का भोग अर्पित करें।
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पाठ: पूजा के उपरांत ‘भैरव चालीसा’ का पाठ करें और भैरव मंत्रों का जाप करें।
🌟 कालाष्टमी व्रत का विशेष महत्व
शास्त्रों में काल भैरव को न्याय, समय और सुरक्षा का देवता माना गया है। कालाष्टमी के दिन सच्चे मन से भैरव देव की आराधना करने से जीवन में अनुशासन, आत्मविश्वास और सकारात्मकता आती है। मान्यता है कि इस दिन किया गया दान और पूजा-पाठ रोग, दोष और अकाल मृत्यु के भय से रक्षा करते हैं।
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