Jashpur News: 850 साल पुराने रियासतकालीन बालाजी मंदिर में गूंजे श्रीकृष्ण के जयकारे, राजपरिवार ने झुलाया झूला

छत्तीसगढ़

जशपुर (छत्तीसगढ़): जशपुर स्थित ऐतिहासिक एवं रियासतकालीन बालाजी मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव अत्यंत हर्षोल्लास और पारंपरिक विधि-विधान के साथ मनाया गया।

इस पावन अवसर पर भगवान लड्डू गोपाल के दर्शन और जन्मोत्सव के साक्षी बनने के लिए मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं का भारी सैलाब उमड़ा। मंदिर के पुजारियों और इतिहासविदों के अनुसार, यहां करीब 27 पीढ़ियों से बिना किसी व्यवधान के यह धार्मिक परंपरा अनवरत रूप से निभाई जा रही है। आधी रात को कान्हा के प्राकट्य के साथ ही पूरा परिसर ‘जय कन्हैया लाल की’ और ‘हरे कृष्णा’ के जयघोष से गूंज उठा।

✨ चांदी के सिंहासन पर बाल गोपाल का प्राकट्य: मध्यरात्रि 12 बजते ही गूंजे जयकारे

जन्मोत्सव का मुख्य विधि-विधान और रात्रि अनुष्ठान:

  • गर्भगृह के पट बंद होना: शास्त्रों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि की मध्यरात्रि में हुआ था। इसी के दृष्टिगत रात करीब 11:30 बजे गर्भगृह के पट बंद कर गुप्त वैदिक अनुष्ठान शुरू किए गए।

  • चांदी के सिंहासन पर विराजित: ठीक रात 12 बजे शंखनाद और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच भगवान का जन्मोत्सव संपन्न हुआ। इसके उपरांत बाल गोपाल को चांदी के भव्य सिंहासन पर विराजमान कराकर बाहर लाया गया।

  • महाभिषेक व आरती: पंचामृत से भगवान का महाभिषेक किया गया, नए वस्त्र व आभूषण पहनाए गए और मध्यरात्रि की महाआरती संपन्न हुई।

📜 850 वर्ष प्राचीन है बालाजी मंदिर का इतिहास: भगवान को माना जाता है ‘राजस्वामी’

इतिहास, राजपरंपरा और मंदिर का अटूट संबंध:

  • 27 पीढ़ियों की विरासत: राजपुरोहित नरेश मिश्रा और मनोज रमाकांत मिश्र बताते हैं कि मंदिर का इतिहास करीब साढ़े 800 से 1000 वर्ष पुराना है और यहां की पूजा पद्धति 27 पीढ़ियों से एक समान रूप से चली आ रही है।

  • राजपरिवार और राजस्वामी: रियासतकाल में भगवान बालाजी को जशपुर राज्य का वास्तविक अधिपति यानी ‘राजस्वामी’ माना जाता था। राजपरिवार स्वयं को केवल उनका सेवक और प्रतिनिधि मानकर शासन का संचालन करता था।

  • आज भी कायम है सहभागिता: आजादी से पहले और बाद में भी राजपरिवार प्रमुख धार्मिक अनुष्ठानों में अपनी परंपरागत भूमिका पूरी निष्ठा से निभाता आ रहा है।

🪢 राजपरिवार से शुरू होती है झूला झुलाने की रस्म: दूसरे दिन भी बना रहता है उल्लास

झूला उत्सव और श्रद्धालुओं की अटूट श्रद्धा:

  • राजपरिवार का पहला अधिकार: भगवान के प्राकट्य और महाआरती के बाद बाल गोपाल को झूला झुलाने की प्रक्रिया शुरू होती है। सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार सबसे पहले राजपरिवार के सदस्यों ने कान्हा को झूला झुलाया, जिसके बाद आम श्रद्धालुओं ने दर्शन कर झूला झुलाया।

  • दूसरे दिन दिनभर दर्शन: जन्मोत्सव के दूसरे दिन भी लड्डू गोपाल पूरे दिन मंदिर परिसर में झूले पर ही विराजमान रहते हैं।

  • परिवारों में विशेष उत्साह: सुबह से ही दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालु, महिलाएं और बच्चे बाल स्वरूप के दर्शन करने और उन्हें झूला झुलाकर आशीर्वाद लेने पहुंचते हैं।

🪔 संध्या महाआरती के बाद गर्भगृह में विश्राम: आस्था और सांस्कृतिक स्मृति का महापर्व

उत्सव का औपचारिक समापन:

  • विशेष आरती: जन्मोत्सव के दूसरे दिन शाम को लड्डू गोपाल की भव्य संध्या आरती की जाती है।

  • गर्भगृह में पुनः स्थापना: सभी पारंपरिक वैदिक अनुष्ठानों को पूर्ण करने के बाद बाल कृष्ण को आदरपूर्वक पुनः मूल गर्भगृह में विराजित किया जाता है।

  • अखंड आस्था का प्रतीक: जशपुर के बालाजी मंदिर की जन्माष्टमी केवल एक सामान्य धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि क्षेत्र के इतिहास, राजपरंपरा, संस्कृति और जन-जन की अटूट आस्था का जीवंत संगम है।

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