Jamshedpur National Conference: जमशेदपुर में पर्वतों और नदियों के संरक्षण पर राष्ट्रीय सम्मेलन; सरयू राय और ‘जलपुरुष’ की बड़ी पहल

झारखण्ड

जमशेदपुर: झारखंड की लौहनगरी जमशेदपुर के बिष्टुपुर स्थित एक प्रतिष्ठित स्कूल के सभागार में शुक्रवार को ‘पर्वतों और नदियों के संरक्षण’ के बेहद संवेदनशील विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का भव्य शुभारंभ हुआ। इस उच्च स्तरीय सम्मेलन में देश के कोने-कोने से आए प्रख्यात पर्यावरणविद, प्रबुद्ध सामाजिक कार्यकर्ता, जल विशेषज्ञ, भू-वैज्ञानिक और बुद्धिजीवी मुख्य रूप से शामिल हुए हैं। पर्यावरण को समर्पित यह महत्वपूर्ण सम्मेलन जमशेदपुर पश्चिम के विधायक और वरिष्ठ नेता सरयू राय की विशेष दूरदर्शी पहल पर आयोजित किया गया है। सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में देश के कोने-कोने से आए प्रतिनिधियों ने पर्यावरण के मौजूदा संकटों पर गहरी चिंता व्यक्त की।

🗻 “पर्वत भारत की पहली आधारभूत संरचना”: विधायक सरयू राय और पूर्व चीफ जस्टिस वी. गोपाल गौड़ा ने कानून बनाने पर दिया जोर

उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए मुख्य आयोजक सह विधायक सरयू राय ने कहा कि पर्वत किसी भी देश या सभ्यता के लिए प्रकृति द्वारा निर्मित पहली और सबसे मजबूत आधारभूत संरचना (इन्फ्रास्ट्रक्चर) होते हैं। उन्होंने वैश्विक संदर्भों का हवाला देते हुए कहा कि आज भारत में नदियों के साथ-साथ पर्वतों के मूल स्वरूप को कानूनी रूप से संरक्षित करने के लिए एक बेहद कड़े और नए कानून के निर्माण की तत्काल आवश्यकता है। इस राष्ट्रीय सम्मेलन में देश के सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश वी. गोपाल गौड़ा ने मुख्य अतिथि के रूप में गरिमामयी उपस्थिति दर्ज कराई, जबकि देश के प्रसिद्ध जल संरक्षणवादी और पर्यावरणविद ‘जलपुरुष’ राजेंद्र सिंह सम्मेलन के मुख्य वक्ता के रूप में शामिल हुए। इस दौरान कानूनी और वैज्ञानिक विशेषज्ञों ने अंधाधुंध खनन के कारण नष्ट हो रहे पहाड़ों को बचाने पर गंभीर विचार रखे।

💧 “प्रकृति का संरक्षण सिर्फ सरकार का नहीं, हर नागरिक का दायित्व”: जलपुरुष राजेंद्र सिंह ने दी जल संकट की बड़ी चेतावनी

सभागार में उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए ‘जलपुरुष’ राजेंद्र सिंह ने बेहद मार्मिक शब्दों में कहा कि भारत की महान सभ्यता, समृद्ध संस्कृति और मानव जीवन का असली आधार हमारे पर्वत और नदियां ही हैं। उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि यदि समय रहते हमारे पर्वत सुरक्षित नहीं रखे गए, तो नदियां भी स्वतः ही पूरी तरह समाप्त हो जाएंगी; जिसके परिणामस्वरूप आने वाली पीढ़ियों के सामने भयंकर जल संकट और अपूरणीय पर्यावरणीय असंतुलन की गंभीर स्थिति उत्पन्न हो जाएगी। उन्होंने जोर देकर कहा कि प्रकृति का संरक्षण केवल सरकारों की फाइलों या बजट की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह समाज के प्रत्येक नागरिक का परम दायित्व है। पर्वत केवल भूगोल की किताबों का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि वे भारत की जल निरंतरता, पारिस्थितिक संतुलन, जैव विविधता, कृषि व्यवस्था और प्राकृतिक आपदाओं के खिलाफ हमारी प्रतिरोधक क्षमता की मूल आधारशिला हैं।

📜 ‘भारतीय पर्वत निरंतरता एवं सुरक्षा अधिनियम 2026’ पर गहन चर्चा: नया कानून बनवाने के लिए संसद में सांसदों की ली जाएगी मदद

इस राष्ट्रीय सम्मेलन के सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी सत्र में प्रस्तावित संवैधानिक ढांचे “भारतीय पर्वत निरंतरता एवं सुरक्षा अधिनियम 2026” के मसौदे (ड्राफ्ट) पर कानूनी विशेषज्ञों के बीच गहन चर्चा की गई। विशेषज्ञों ने रेखांकित किया कि वर्तमान में भारत में जंगलों, अवैध खनन, वन्यजीवों और सामान्य पर्यावरण संरक्षण के लिए तो कई कानून और नियामक संस्थाएं मौजूद हैं, लेकिन अब तक पर्वतों को सीधे तौर पर एक स्वतंत्र इकाई मानकर कानूनी सुरक्षा प्रदान करने के लिए देश में कोई ठोस संवैधानिक व्यवस्था नहीं बनाई गई है। जल पुरुष राजेंद्र सिंह और विधायक सरयू राय ने संयुक्त रूप से कहा कि सम्मेलन में सर्वसम्मति से पारित होने वाले इन नीतिगत विषयों को देश की सबसे बड़ी पंचायत (संसद) में पुरजोर तरीके से उठाने के लिए विभिन्न दलों के सांसदों की मदद ली जाएगी, ताकि मानसून सत्र में इस गंभीर मुद्दे पर चर्चा हो सके और एक नया राष्ट्रीय कानून बनाने की दिशा में प्रभावी कदम बढ़ाया जा सके।

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