Jalandhar का मेयर कोई भी बने, बैठना उसे कांटों के सिंहासन पर ही होगा, पढ़ें पूरी खबर

पंजाब

जालंधर: पंजाब में नगर निगमों के चुनाव संपन्न हो चुके हैं और आम आदमी पार्टी इन निगमों में सत्ताप्राप्ति के लिए संघर्ष करती भी दिख रही है। जालंधर की बात करें तो बहुमत से पीछे रहने के बावजूद आम आदमी पार्टी नए हाऊस के लिए बहुमत जुटा चुकी है। जालंधर में ‘आप’ को अपना मेयर बनाने के 43 पार्षद चाहिए और 44 पार्षद ‘आप’ खेमे में आ चुके हैं। ऐसे में आम आदमी पार्टी का मेयर बनने जा रहा है। मेयर के चुनाव के लिए पिछले कई दिनों से कश्मकश का दौर चल रहा है। इस पद के लिए पहले चार-पांच उम्मीदवार मैदान में थे पर आखिरी वक्त में 2 दावेदार ही बच गए थे। ऐसे में मेयर का चुनाव करने हेतु गठित कमेटी ने आपस में बैठकर सर्वसम्मति बनाने का फैसला लिया परंतु फिर भी एक नाम पर सहमति नहीं बन पाई। जालंधर के मेयर के चुनाव के लिए आज शुक्रवार को भी चंडीगढ़ में एक बैठक हुई जिसमें विभिन्न पक्षों पर विचार किया गया परंतु देर शाम तक नाम की घोषणा नहीं की गई। इतना जरूर पता चला है कि कमेटी के ज्यादातर सदस्य एक नाम पर लगभग सहमत हो चुके हैं।

कूड़े की समस्या, टूटी सड़कों और गंदे पानी की मुश्किलें झेल रहा शहर
शहर में आम चर्चा है कि पहले अकाली- भाजपा और उसके बाद कांग्रेस सरकार के शासन में जालंधर नगर निगम के सिस्टम का भट्ठा बैठ गयाथा परंतु तथ्य यह भी है कि आप की सरकार बने भी अब 3 साल होने को हैं, फिर भी जालधर निगम का सिस्टम सुधरने का नाम नहीं ले रहा और शहर के हालात बद से बदत्तर होते जा रहे हैं। चाहे निगम चुनावों से ठीक एक महीना पहले नगर निगमने खूब मेहनत करके शहर को साफ-सुथरा करने का अभियान चलाया परंतु आज भी शहर की कई सड़कें टूटी हुई हैं और उन पर पैचवर्क तक नहीं किया जा रहा। आज भी जगह-जगह कूड़े के ढेर लगे हुए हैं जिन्हें उठाया नहीं जा रहा और जगह- जगह बरसात तथा सीवर का गंदा पानी खड़ा है जिस ओर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा। ऐसे में साफ दिखता है कि जालंधर शहर कई साल पीछे चला गया है। जो शहर कभी रहने सहने के मामले में पंजाब का नंबर वज हुआ करता था आज छोटे-छोटे शहरों से भी पीछे माना जा रहा है। ऐसी स्थिति में तय है कि आने वाले दिनों में जालंधर शहर का मेयर कोई भी बने, उसे कांटों के सिंहासन पर बैठना ही होगा और पूरा जोर लगाकर शहर की बिगड़ चुकी हालत को सुधारना होगा वरना कुछ समय बाद होने वाले विधान सभा चुनावों में सत्तापक्ष को अच्छी खासी मुश्किलें झेलनी पड़ सकती हैं।

जालंधर निगम के पार्षद हाऊस पर हावी हो चुकी है अफसरशाही
बाकी शहरों के निगमों का तो पता नहीं परंतु जालंधर नगर निगम का पार्षद हाऊसइस समय केवल फॉर्मेलिटी बन चुका है। पिछले कई सालों से हाऊस की बैठकें केवल खानापूर्ति या दिखावे मात्र के लिए होती रही हैं ताकि प्रशासनिक मंजूरियों इत्यादि को समय रहते पूरा किया जा सके और फाइलों का पेट भर सके। पिछले 5 साल रहे कांग्रेस के राज दौरान जालंधर निगम के पार्षद हाऊस की इतनी दुर्गति हुई कि अब पार्षद भी हाऊस में दिलचस्पी नहीं लेते। कभी समय था जब निगमों के पार्षद हाउस को सुप्रीम’ कहा जाता था। तब बड़े से बड़ा धाकड़ अफसर भी पार्षद हाऊसका सामना करने से घबराता था। हाऊस दौरान हुई चर्चा में अगर किसी निगम कर्मचारी या अधिकारी का नाम आ जाता था तो उस अफसर के चेहरे पर आया पसीना देखने लायक होताथा परतु अब जालंधर निगम और चंडीगढ़ बैठी लोकल बॉडीज की अफसरशाही चुने हुए प्रतिनिधियों पर इतनी हावी हो चुकी है कि अफसर पार्षद हाऊस में ही पार्षदों को आंखें तक दिखाने लग गए हैं। अब तो ऐसा समय आ गया है कि पार्षद हाऊस अगर किसी विषय पर सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास करता है तो पहले तो जालंधर निगम के अधिकारीही उसेहल्के में लेते हैं और चंडीगढ़ में बैठे लोकल बॉडीज के अफसर तो उस प्रस्ताव को मानो रद्दी की टोकरी में ही फेंक देते हैं। अब चाहे 85 पार्षद नए सिरे से चुनकर आ रहे हैं और उनमें से करीब 60 नए हैं, इसलिए माना जा रहा है कि पार्षद हाऊस का सुप्रीम स्टेट्स फिर बहाल होगा।

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