FII Selling: भारतीय बाजार से ₹1.78 लाख करोड़ लेकर निकले विदेशी निवेशक, ये हैं वो 7 बड़े कारण जिनसे डरे हुए हैं FIIs

व्यापार

फरवरी के आखिर में ईरान वॉर शुरू होने के बाद से, विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने भारतीय इक्विटी से 19 अरब डॉलर यानी करीब 1.78 लाख करोड़ की भारी-भरकम रकम निकाल ली है, जिससे निफ्टी अपने 52-हफ्ते के पीक से 9 फीसदी से ज्यादा गिर गया है. जो बाजार दुनिया की पसंदीदा उभरते बाजारों में एक था, वो अब ऊर्जा की बढ़ती कीमतों के बीच वैश्विक पूंजी के पलायन के कारण तेजी से एक “नो-गो” जोन में बदल गया है. बाजार में आई भारी गिरावट ने वैल्यूएशन को फेयर लेवल पर ला दिया है, फिर भी इंस्टीट्यूशनल डेस्क अभी तक “जबरदस्त खरीदारी” का संकेत नहीं दे रहे हैं. इसके बजाय, एक तरह की बेचैनी हावी हो गई है, क्योंकि डॉलर-बेस्ड निवेशकों के लिए गणितीय समीकरण पूरी तरह से बिगड़ गया है.

एलारा सिक्योरिटीज के बाजार डेटा से पता चलता है कि उभरते बाजारों में भारत एक अपवाद बना हुआ है, क्योंकि यहां लगातार 5वें हफ्ते भी एफआईआई की ओर से बिकवाली जारी रही. वहीं दूसरी ओर दूसरे उभरते बाजारों में विदेशी निवेशक लगातार पैसा लगा रहे हैं. आइए आपको भी बताते हैं कि आखिर वो कौन से 7 कारण है जिनकी वजह से शेयर बाजार निवेशक भारत के बाजार से काफी डरे हुए हैं…

इन बातों से डरे हुए विदेशी निवेशक

    1. सीजफायर बना भ्रम : ईरान-अमेरिका संघर्ष में दो सप्ताह के विराम ने बाजारों में थोड़ी तेजी तो लाई, लेकिन संस्थागत निवेशक इसे निर्णायक मोड़ नहीं मान रहे हैं. विदेशी निवेशक (FII) इस विराम को कूटनीतिक नहीं, बल्कि रणनीतिक मानते हैं. नाकाबंदी की आशंका और दूसरे फेज के संघर्ष के बढ़ते खतरे को देखते हुए, ग्लोबल फंड लॉन्गटर्म डील पर हस्ताक्षर होने तक न्यूट्रल रुख अपना रहे हैं. बाजार की भाषा में, यह क्षणिक उछाल है और समझदार निवेशक इसे बखूबी समझते हैं.
    2. कच्चा तेल: दोहरे घाटे का टाइम बम: 100 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच रहा ब्रेंट क्रूड न केवल भारत के लिए ऊर्जा से जुड़ी समस्या है, बल्कि व्यापक स्थिरता के लिए भी खतरा है. FII दोहरे घाटे के जाल से भली-भांति परिचित हैं: तेल की ऊंची कीमतें चालू खाता घाटे को बढ़ाती हैं और घरेलू महंगाई को भी बढ़ाती हैं, जिससे भारतीय रिजर्व बैंक पर ब्याज दरें बढ़ाने का दबाव बनता है, ठीक उसी समय जब इकोनॉमी को राहत की सबसे ज्यादा जरूरत होती है.

  1. रिस्क ​प्रीमियम हुआ कम: विदेशी निवेशकों के लिए गणित पूरी तरह से बदल गया है. जैसे-जैसे अमेरिकी 10-साल का ट्रेजरी यील्ड 4.5 फीसदी की ओर बढ़ रही है, भारतीय शेयरों में निवेश करने का रिस्क प्रीमियम तेजी से कम हो गया है. रुपए का कमजोर होना इस समस्या को और भी ज्यादा जटिल हो गया है. हाल ही में डॉलर के मुकाबले में रुपए 95 का लेवल पर आ गया था.
  2. ज्यादा रिटर्न दे रहे दूसरे बाजार: भारत दूसरे उभरते हुए बाजारों के मुकाबले में विदेशी निवेशकों को काफी कम रिटर्न दे रहा है. दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे बाजार विदेशी निवेशकों के नजरिए से कहीं अधिक आकर्षक माने जाते हैं, क्योंकि वित्त वर्ष 2027 में भारत के मामूली अनुमानों की तुलना में इन देशों में इनकम ग्र ग्रोथ की उम्मीदें कहीं अधिक हैं.
  3. भारत का टैक्स सिस्टम भी मुसीबत: भारत की बदलती टैक्स प्रणाली को संरचनात्मक अवरोध के रूप में देखा जा रहा है. 2024 के केंद्रीय बजट में शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन को 15 फीसदी से बढ़ाकर 20 फीसदी कर दिया गया और लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन को 10 फीसदी से बढ़ाकर 12.5 फीसदी कर दिया गया. LTCG/STCG स्ट्रक्चर में बदलाव और FY27 से सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) में बढ़ोतरी के साथ मिलकर, ग्लोबल फंड्स के लिए एंट्री और एग्ज़िट की कॉस्ट काफी बढ़ गई है. वियतनाम या इंडोनेशिया जैसे प्रतिस्पर्धी डेस्टिनेशन्स में टैक्स-फ्रेंडली व्यवस्थाओं की तुलना में, भारत का फ्रेमवर्क अब उतना आकर्षक नहीं रहा जितना पहले था.
  4. साढ़े चार साल तक जीरो रिटर्न: शायद ग्लोबल इन्वेस्टमेंट बैंकों में सबसे ज्यादा चर्चा में रहने वाला आंकड़ा यह है: US डॉलर के हिसाब से देखें तो, Nifty ने 2021 के आखिर से अब तक लगभग ज़ीरो CAGR दिया है. किसी ऐसे ग्लोबल फंड मैनेजर के लिए जिसने चार साल से ज्यादा समय तक भारतीय स्टॉक्स अपने पास रखे, और फिर देखा कि करेंसी की कीमत गिरने से उसका सारा कैपिटल गेन खत्म हो गया, इन्वेस्टमेंट कमेटी के सामने दोबारा एंट्री का प्रस्ताव रखना एक बेहद मुश्किल बातचीत बन जाती है.
  5. कमाई का झटका: मौजूदा जियोपॉलिटिकल संकट से परे, एक गहरा डर पनप रहा है: India Inc. की कमाई में एक स्ट्रक्चरल गिरावट का डर. युद्ध की वजह से सप्लाई चेन में आई रुकावटें और इनपुट कॉस्ट में बढ़ोतरी का असर भारत के मैन्युफैक्चरिंग और FMCG सेक्टर्स के Q1 और Q2 मार्जिन पर काफी ज्यादा पड़ने की उम्मीद है. ऐसा लगता है कि FIIs इस कमाई के झटके का अंदाजा लगाकर, आधिकारिक आंकड़े आने से पहले ही बाजार से निकल रहे हैं, जबकि मैक्रो डेटा पहले से ही इस बात का संकेत दे रहा है. दो अंकों में कमाई में बढ़ोतरी, जिससे FY27 की पहचान बनने की उम्मीद थी, अब गंभीर खतरे में है. अगर जियोपॉलिटिकल तूफान बना रहता है, तो यह बढ़ोतरी घटकर एक अंक में आ सकती है, कम से कम दो तिमाहियों के लिए टल सकती है, और शायद स्ट्रक्चरल तौर पर और भी नीचे जा सकती है.

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