हीटवेव का डबल अटैक: भारत में बढ़ेंगे अत्यधिक गर्मी के दिन, डेटा सेंटरों और स्वास्थ्य पर होगा सीधा असर

दिल्ली

नई दिल्ली: जलवायु परिवर्तन (Climate Change) अब केवल एक वैश्विक मुद्दा नहीं, बल्कि भारत के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुका है। पर्यावरण थिंक टैंक ‘काउंसिल फॉर एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (CEEW)’ की हालिया रिपोर्ट ने देश के भविष्य पर खतरे की घंटी बजा दी है। रिपोर्ट के अनुसार, आने वाले दो दशकों में भारत को अत्यधिक गर्मी और बदलती जलवायु के दोहरे संकट का सामना करना पड़ सकता है।

1. AI से हुआ चौंकाने वाला खुलासा

यह रिपोर्ट CRAVIS (क्लाइमेट रेजिलियंस एनालिटिक्स एंड विजुअलाइजेशन इंटेलिजेंस सिस्टम) नामक AI-संचालित प्लेटफॉर्म पर आधारित है। इसने भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD), IITM पुणे और भारतीय वन सर्वेक्षण के पिछले 40 वर्षों के डेटा का विश्लेषण कर 2070 तक की जलवायु स्थितियों का पूर्वानुमान लगाया है।

2. स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था पर सीधा असर

रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष चिंताजनक हैं:

  • अतिरिक्त गर्म दिन: अगले 20 वर्षों में भारत को हर साल 15 से 40 ऐसे दिन देखने पड़ सकते हैं, जब तापमान सामान्य से काफी अधिक होगा।

  • हीट स्ट्रेस का खतरा: सिर्फ दिन ही नहीं, अब रातें भी गर्म होंगी। कई इलाकों में साल के 20 से 40 दिन असामान्य रूप से गर्म होंगे। रात में तापमान कम न होने से शरीर को प्राकृतिक रूप से ठंडा होने का मौका नहीं मिलता, जिससे ‘हीट स्ट्रेस’ और स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याएं बढ़ेंगी।

  • आर्थिक प्रभाव: गर्मी बढ़ने का असर देश की बुनियादी सुविधाओं पर भी पड़ेगा। भारत के 281 डेटा सेंटरों का ऑपरेटिंग खर्च बढ़ जाएगा, क्योंकि उन्हें 24×7 ठंडा रखने के लिए अत्यधिक कूलिंग की आवश्यकता होगी।

3. ‘दोहरा संकट’ झेलेंगे ये राज्य

रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ राज्य ऐसे हैं जहाँ ‘गर्मी’ और ‘बारिश’ दोनों का जोखिम एक साथ बढ़ेगा। महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे राज्यों में 10 से 30 दिनों तक अतिरिक्त गर्मी और बेमौसम भारी बारिश की आशंका है। इस ‘दोहरे असर’ से न केवल स्वास्थ्य जोखिम बढ़ेगा, बल्कि काम करने की क्षमता (Productivity) और बुनियादी ढांचे पर भी बुरा असर पड़ेगा।

निष्कर्ष

CEEW की यह रिपोर्ट चेतावनी देती है कि लगातार गर्म रहने वाली रातें और बढ़ते तापमान भारत के लिए एक बड़े आर्थिक और मानवीय संकट का संकेत हैं। यह रिपोर्ट न केवल आम लोगों के स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय है, बल्कि यह देश की आर्थिक गतिविधियों और कार्यक्षमता (Labour Productivity) के लिए भी एक बड़ी चुनौती पेश करती है। समय रहते जलवायु अनुकूल रणनीतियाँ (Climate Resilience Policies) अपनाना अब भारत की प्राथमिकता होनी चाहिए।

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