छुईखदान को विधानसभा बनाने की मांग, जिला में नाम के बाद भी उपेक्षा का आरोप

छत्तीसगढ़

खैरागढ़ : छुईखदान की धरती पर 9 जनवरी की शाम सिर्फ दीपक ही नहीं जले, बल्कि दशकों से दबी पीड़ा और उपेक्षा की आग भी साफ दिखाई दी. 1953 के ऐतिहासिक गोलीकांड की पुण्यतिथि पर शहीदों को श्रद्धांजलि देने जुटे हजारों लोगों ने यह जता दिया कि यह आयोजन केवल स्मरण नहीं, बल्कि आने वाले बड़े संघर्ष की भूमिका है.

श्रद्धांजलि सभा ने लिया जन आंदोलन की शक्ल

दीयों की रोशनी के बीच छुईखदान से एक बुलंद आवाज उठी कि छुईखदान को विधानसभा का दर्जा हर हाल में मिलना चाहिए.इस आयोजन की सबसे खास बात ये रही कि यहां राजनीति के झंडे नहीं, बल्कि दर्द और अधिकार की बात नजर आई.बीजेपी और कांग्रेस सहित अलग-अलग दलों के कार्यकर्ता और आम नागरिक एक ही मंच पर एक ही मांग के साथ खड़े दिखे. किसी ने पार्टी का नाम नहीं लिया, सिर्फ छुईखदान के हक की बात हुई. यही वजह रही कि श्रद्धांजलि का यह कार्यक्रम धीरे धीरे एक जन आंदोलन में बदलता दिखा.

तीन जगहों की भौगोलिक स्थिति अलग

स्थानीय लोगों का कहना है कि खैरागढ़, छुईखदान और गंडई को मिलाकर जिला बनना कागजों में बड़ी उपलब्धि हो सकती है, लेकिन जमीनी सच्चाई कुछ और ही है. जिला बनने के बाद भी छुईखदान और गंडई की हालत में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया. खैरागढ़, छुईखदान और गंडई तीन अलग-अलग भौगोलिक और सामाजिक क्षेत्र हैं. खैरागढ़ से छुईखदान की दूरी करीब पंद्रह किलोमीटर है, जबकि गंडई और भी दूर है. ऐसे में एक ही प्रशासनिक ढांचे में सबको बांधना शुरू से ही अव्यवहारिक माना गया.प्रशासन तक पहुंच मुश्किल है.विकास की रफ्तार बेहद धीमी है.बड़े दफ्तर अफसर और फैसले आज भी खैरागढ़ तक सीमित हैं, जबकि बाकी क्षेत्र खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं.जिला बनने से पहले जैसी स्थिति थी, हालात आज भी लगभग वैसे ही हैं

हमारी कोशिश है कि हम छुईखदान को विधानसभा बनाकर रहेंगे. भले ही भूपेश बघेल ने तीन जगहों को मिलाकर एक जिला बनाया हो,लेकिन उन्होंने ये वादा किया था कि तीनों जगह पर सामान प्रशासनिक व्यवस्थाएं रहेंगी,ताकि क्षेत्र का विकास ना रुके. लेकिन ऐसा नहीं हुआ ज्यादातर ऑफिस गंडई और खैरागढ़ में हैं.ऐसे में छुईखदान आज भी वैसा है जैसा कल था.हम चाहते हैं कि छुईखदान के साथ ये सौतेला व्यवहार ना हो,वो अपनी अलग पहचान बनाए- सज्जाद खान, पत्रकार

विधानसभा का दर्जा देने की मांग

इसी नाराजगी ने अब एक साफ और सीधी मांग का रूप ले लिया है.छुईखदान के लोग कह रहे हैं कि जिले के नाम में उनका नाम भले ही न रहे, लेकिन उनकी पहचान और आवाज खत्म न की जाए. विधानसभा का दर्जा मिलने से ही क्षेत्र की बात सीधे सदन तक पहुंचेगी और यही उनकी सबसे बड़ी जरूरत है.

छुईखदान को भले ही जिले में नाम मिला है,लेकिन एक भी कार्यालय छुईखदान में नहीं खुला है. ना ही कार्यालय खोलने को लेकर किसी तरह की घोषणा हुई है.इसलिए छुईखदान चाहती है कि उसका भी विकास हो.छुईखदान ये भी चाहती है कि उसे अलग विधानसभा का दर्जा दिया जाए ताकि वो अपना विकास खुद कर सके- राजा गिरिराज किशोर दास,स्थानीय

1953 में अधिकारों के लिए शहादत देने वाले शहीदों की याद में जले दीयों ने आज नई पीढ़ी को संघर्ष के लिए खड़ा कर दिया है. मंच से संदेश साफ था कि यह लड़ाई किसी दल के खिलाफ नहीं, बल्कि व्यवस्था की उपेक्षा के खिलाफ है.अगर अब भी छुईखदान की आवाज अनसुनी रही, तो यह शांत रोशनी जल्द ही एक बड़े आंदोलन में बदल सकती है.

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