Dattatreya Hosabale on Sant Ravidas: संत परंपरा में श्री रविदास का स्थान अद्वितीय, दत्तात्रेय होसबाले ने बताया उन्हें सामाजिक समरसता का प्रेरणास्त्रोत

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने संत शिरोमणि सद्गुरु श्री रविदास के 650वें प्राकट्य वर्ष के अवसर पर उन्हें श्रद्धा के फूल अर्पित किया. दत्तात्रेय होसबाले ने कहा ये हमारी श्रेष्ठ संत परंपरा ईश्वर की भारत को एक विशेष पहचान देता है. संघ की तरफ से कहा गया कि ये हमारे प्रदीर्घ इतिहास के प्रवाह में इस महान संत परंपरा ने जहां समाज में ईश्वर की उपासना और भक्ति भाव का जागरण किया. वहीं सामाजिक कुरीतियों और भेदभाव को खत्म करते हुए समरस समाज के दृढ़ीकरण के प्रयास किए. साथ ही उन्होंने विदेशी शासकों के अत्याचारों के खिलाफ संघर्ष के लिए समाज को जागृत और सिद्ध भी किया है.

दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि इस महान संत परंपरा में संत रविदास जी का विशिष्ट स्थान है. उनका कर्मशील जीवन और कार्य हम सबके लिए प्रेरणास्रोत है. गृहस्थ होते हुए भी सांसारिक बातों से दूर रहकर साधु-संतों के प्रति श्रद्धा और दीन-हीनों के प्रति सेवा उनका सहज स्वभाव था. ये आध्यात्मिक दृष्टि से परिपूर्ण था. उन्होंने अपने जीवन से समाज में श्रम की प्रतिष्ठा और शुद्ध, सात्विक एवं पारदर्शी आचरण की महत्ता पुनर्स्थापित की.

‘समाज में एक नई चेतना प्रवाहित की’

दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि संत श्री रविदास जी भक्ति की भाव-धारा के महान संत थे. इन्होंने समाज में एक नई चेतना प्रवाहित की. उन्होंने जन्म के आधार पर ऊंच-नीच के भेद को नकारते हुए आचरण को ही सबसे ऊंची कसौटी माना. रूढ़ियों और कुरीतियों से समाज की मुक्ति तथा कालबाह्य परंपराओं को त्यागने और काल सुसंगत सामाजिक परिवर्तनों को अंगीकार करने हेतु समाज का मानस बनाने में उनकी ऐतिहासिक भूमिका रही है. उनके विचारों का महत्व समझकर श्री गुरुग्रंथ साहिब में उनकी 41 वाणियों को शबद रूप में समाहित किया गया है.

दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि सामान्य पारिवारिक पृष्ठभूमि से आने वाले संत श्री रविदास जी का ईश्वर-भक्ति, सेवा भाव तथा समाज के प्रति निश्छल प्रेम के कारण काशी के विद्वत्-जनों सहित समाज के सभी वर्गों ने उनकी महानता को स्वीकृत किया. काशी नरेश, झाली रानी तथा मीराबाई जैसे राजपरिवारों के सदस्यों ने भी उनको अपना गुरु माना. गुरु और शिष्य के रूप में संत श्री रविदास जी और मीराबाई का नाता निर्गुण और सगुण भक्ति धाराओं का मिलन है. जातिभेद मानने वालों के लिए पालन करे वाली सीख भी है.

दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि सद्गुरु संत श्री रविदास जी को मतांतरित कर मुस्लिम बनाने के अनेक प्रयास हुए, किन्तु उनकी भक्ति और आध्यात्मिक साधना से प्रभावित होकर उन्हें मतांतरित करने वाले ही उनके अनुयायी बन गए.

वर्तमान समय में जब विविध विभाजनकारी शक्तियां जन-मानस को वर्ग और जाति के आधार पर बांटने का प्रयास कर रही हैं, तब पूज्य संत श्री रविदास जी के जीवन-संदेश के मर्म को समझकर हम सभी को देश और समाज की एकात्मता के लिए काम करने का संकल्प लेने की जरूरत है.

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