झरिया (धनबाद): झरिया का कोयरीबांध इलाका आज पूरे देश के लिए भाईचारे और सामाजिक एकता की एक जीवंत मिसाल बन चुका है। यहां मुहर्रम का आयोजन किसी एक समुदाय का नहीं, बल्कि संपूर्ण समाज की साझी विरासत है। पिछले 101 वर्षों से यहां हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग कंधे से कंधा मिलाकर मुहर्रम की रस्में निभाते आ रहे हैं, जो आज गंगा-जमुनी तहजीब की पहचान बन चुका है।
🕰️ पीढ़ियां बदलीं, पर प्रेम और विश्वास की डोर अटूट रही
झरिया के बुजुर्ग बताते हैं कि उनके पुरखों ने जिस आपसी सद्भाव की नींव 1925 में रखी थी, वह आज भी उतनी ही मजबूती के साथ कायम है। समय के साथ पीढ़ियां बदलीं, लेकिन समाज का आपसी विश्वास और प्रेम कभी कमजोर नहीं हुआ। ताजिया निर्माण से लेकर अखाड़े की तैयारी तक, हर काम में हर धर्म के लोग बढ़-चढ़कर अपनी भागीदारी सुनिश्चित करते हैं।
⚔️ महाबली भीमसेन दल: सौहार्द का सबसे बड़ा प्रमाण
इस एकता की सबसे बड़ी पहचान ‘महाबली भीमसेन दल झरिया अखाड़ा’ है। दिलचस्प बात यह है कि हिंदू समाज के नेतृत्व में संचालित होने वाले इस अखाड़े में लगभग 90% सदस्य अन्य समुदायों से आते हैं। अखाड़ा समिति के अध्यक्ष चंदन वर्मा और सदस्य अमृत सिंह बताते हैं कि यह जुलूस नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही वह सामाजिक एकता है, जिसका इंतजार झरिया के लोग पूरे साल करते हैं।
🏮 अनुशासन और श्रद्धा का संगम
मुहर्रम के दौरान निकलने वाले जुलूस में अनुशासन का अनूठा उदाहरण देखने को मिलता है। पारंपरिक ढोल-नगाड़ों की गूंज और ‘या हुसैन’ की सदाओं के बीच, रास्ते में हर समुदाय के लोग स्वागत के लिए तत्पर रहते हैं। कहीं पानी और शरबत की व्यवस्था होती है, तो कहीं लोग फूल बरसाकर जुलूस का सम्मान करते हैं।
🕊️ समाज के लिए बड़ा संदेश
कोयरीबांध की यह परंपरा बताती है कि जब दिलों में सम्मान हो, तो धर्म और जाति की दीवारें स्वतः गिर जाती हैं। इमाम हुसैन की शहादत का यह पर्व यहां अन्याय के खिलाफ संघर्ष और मानवता का संदेश देता है। आज के दौर में, जब देश को आपसी विश्वास की सबसे अधिक आवश्यकता है, झरिया का यह छोटा-सा इलाका पूरे भारत को प्रेम और शांति का बड़ा संदेश दे रहा है।
What do you feel about this post?
Like
Love
Happy
Haha
Sad
