अपनी अनूठी, प्राचीन और समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं के लिए पूरी दुनिया में मशहूर बस्तर का ऐतिहासिक महापर्व ‘बस्तर दशहरा’ हर्षोल्लास और गहरी आस्था के साथ शुरू हो गया है। करीब 7 सदियों पुरानी इस गौरवशाली परंपरा का शुभारंभ हर साल की तरह इस बार भी पारंपरिक पूजा विधान ‘काछनगादी’ रस्म के साथ संपन्न हुआ। इस विशेष रस्म के तहत पनका समाज की नाबालिग कुंवारी कन्या पीहू ने काछनदेवी का स्वरूप धारण किया और 75 दिनों तक चलने वाले इस विश्व प्रसिद्ध महापर्व के निर्विघ्न आयोजन की स्वीकृति दी।
🌵 कांटों के झूले पर विराजीं काछनदेवी: राजपरिवार और प्रशासन को दी दशहरा मनाने की अनुमति
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस अनुष्ठान के दौरान कन्या के शरीर में स्वयं काछनदेवी की सवारी आती है। जब देवी रूपी बालिका को बेल के नुकीले कांटों से तैयार किए गए विशेष झूले पर लिटाया गया, तो वहां मौजूद श्रद्धालु जयकारों और श्रद्धा भाव से भर उठे। इस कठिन झूले पर बैठकर देवी ने बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव, मांझी-चालकी, दशहरा समिति और स्थानीय प्रशासन को आगामी सभी पूजा विधान और रथ यात्रा संपन्न कराने की औपचारिक अनुमति प्रदान की, जिसके बाद सभी दंतेश्वरी मंदिर की ओर लौटे।
🪔 600 से अधिक सालों की परंपरा, पितृ पक्ष में केवल काछन व रैला देवी की होती है विशेष पूजा
बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव और मंदिर के पुजारियों ने बताया कि सदियों पुरानी इस परंपरा का बस्तर में विशेष महत्व है। आमतौर पर पितृ पक्ष में किसी भी देवी-देवता का पूजा-पाठ नहीं होता, लेकिन पूर्वज मानी जाने वाली काछन देवी और रैला देवी की विशेष पूजा इस दौरान की जाती है। काछनगादी रस्म के बाद अब कलश स्थापना, रथ परिक्रमा और अन्य प्रमुख रस्में क्रमबद्ध तरीके से निभाई जाएंगी। इस दौरान गुरु मां और मुख्य पुजारियों द्वारा पारंपरिक धनकुल गीत भी गाए गए।
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