रायसेन (मध्य प्रदेश): मध्य प्रदेश के रायसेन जिले से सरकारी शिक्षा व्यवस्था की बदहाली और प्रशासनिक ढुलमुल रवैये की एक हैरान कर देने वाली तस्वीर सामने आई है।
उदयपुरा स्थित शासकीय सांदीपनि विद्यालय में जब स्कूल बसों की भारी कमी सामने आई, तो स्कूल प्रबंधन ने अपनी प्रशासनिक विफलता छुपाने के लिए अध्यापन का एक नया ‘अल्टरनेट डे’ (एक दिन छोड़कर एक दिन) फॉर्मूला लागू कर दिया। स्कूल प्राचार्य द्वारा जारी आदेश के अनुसार, अब इस विद्यालय में एक दिन छात्र (लड़के) और अगले दिन छात्राएं (लड़कियां) पढ़ाई करने आएंगे। डिजिटल इंडिया और स्मार्ट क्लास के दौर में बच्चों के मौलिक शिक्षा अधिकार और स्कूल जाने की राह अब बसों की उपलब्धता तय कर रही है।
📊 2,800 छात्रों का दाखिला, 16 बसों में 700 बच्चों के परिवहन का संकट
विद्यालय में छात्र संख्या और उपलब्ध परिवहन संसाधनों का गंभीर असंतुलन सामने आया है:
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दाखिला व मांग: उदयपुरा स्थित सांदीपनि विद्यालय में मौजूदा शैक्षणिक सत्र में करीब 2,800 छात्र-छात्राओं ने प्रवेश लिया है, जिनमें से दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों से आने वाले लगभग 1,700 विद्यार्थियों ने स्कूल बस सुविधा के लिए आवेदन किया था।
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बसों की क्षमता: सुरक्षा मानकों और परिवहन नियमों के अनुसार एक बस में अधिकतम 55 से 60 विद्यार्थियों को ही सुरक्षित रूप से बैठाया जा सकता है।
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संसाधनों की कमी: इस नियम के तहत स्कूल के पास मौजूद कुल 16 बसों में केवल 1,000 बच्चे ही सफर कर सकते हैं, जबकि शेष बचे 700 बच्चों के लिए परिवहन की कोई व्यवस्था नहीं हो सकी।
📜 अतिरिक्त बसें जुटाने के बजाय प्राचार्य ने जारी कर दिया तुगलकी फरमान
परिवहन विभाग या उच्चाधिकारियों से अतिरिक्त बसों की व्यवस्था कराने के स्थान पर स्कूल स्तर पर ही अजीबोगरीब आदेश निकाल दिया गया:
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प्राचार्य का आदेश: विद्यालय की प्राचार्य वंदना मिश्रा ने एक आधिकारिक सूचना पत्र जारी करते हुए निर्देश दिया कि बसों की कमी को देखते हुए छात्र और छात्राएं बारी-बारी से एक-एक दिन छोड़कर स्कूल आएंगे।
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हफ्ते में सिर्फ 3 दिन पढ़ाई: इस आदेश के चलते सरकारी बसों पर निर्भर रहने वाले गरीब और ग्रामीण परिवेश के छात्र-छात्राएं सप्ताह में केवल 3 दिन ही विद्यालय पहुंच पा रहे हैं।
🔄 एक ही पाठ की पुनरावृत्ति से शैक्षणिक स्तर प्रभावित, निजी साधन वालों को ही छूट
स्कूल प्रशासन के इस फैसले से पाठ्यक्रम और शिक्षण व्यवस्था पर गंभीर असर पड़ रहा है:
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दोहराव का नुकसान: नए शैक्षणिक पैटर्न के तहत जो पाठ सोमवार को लड़कों को पढ़ाया जाता है, वही पाठ मंगलवार को लड़कियों के लिए दोबारा पढ़ाया जाता है, जिससे शैक्षणिक समय की बर्बादी हो रही है और सिलेबस पिछड़ रहा है।
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आर्थिक विषमता: स्कूल प्रशासन का तर्क है कि जो छात्र अपने निजी खर्च या स्वयं के साधन से प्रतिदिन आना चाहें, वे आ सकते हैं; परंतु सरकारी व्यवस्था पर आश्रित निर्धन वर्ग के बच्चे इस अव्यवस्था का खामियाजा भुगतने को मजबूर हैं।
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