बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि केंद्र सरकार के फैसलों का विरोध करना या उनके खिलाफ नारे लगाना किसी नागरिक को क्षेत्र से निष्कासित करने का आधार नहीं हो सकता। जस्टिस माधव जामदार की एकल पीठ ने सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के नेता सईद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी के खिलाफ पारित निष्कासन आदेश को रद्द करते हुए पुलिस और सरकार की कार्रवाई पर कड़ी नाराजगी जताई है।
🗣️ ‘क्या नागरिक सरकार के गुलाम हैं?’—जस्टिस जामदार की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान जस्टिस जामदार ने तल्ख टिप्पणी करते हुए पूछा, ‘ये क्या हो रहा है? क्या सभी नागरिकों को सरकार का गुलाम बनाया जा रहा है?’ अदालत ने कहा कि नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और अन्य सरकारी फैसलों का विरोध करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है। याचिकाकर्ता पर केवल ‘बीजेपी सरकार मुर्दाबाद’ जैसे नारे लगाने के लिए की गई निष्कासन की कार्रवाई को कोर्ट ने पूरी तरह दुर्भावनापूर्ण और असंवैधानिक करार दिया है।
👮 ‘पुलिस मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की नहीं, लोक सेवक है’
अदालत ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि पुलिस को अपनी भूमिका समझनी चाहिए। उन्होंने दो टूक कहा, ‘पुलिस मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की नहीं, बल्कि लोक सेवक है।’ इसके साथ ही कोर्ट ने महाराष्ट्र की राजनीतिक स्थिति पर तंज कसते हुए कहा कि जहां पूरे राज्य में पार्टियों के बीच पाला बदलने और खरीद-फरोख्त का खेल चल रहा है, वहां एक नागरिक के खिलाफ सिर्फ विरोध प्रदर्शन के आधार पर एफआईआर दर्ज करना और उसे निष्कासित करना न्यायोचित नहीं है।
📜 संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 का सम्मान अनिवार्य
अपने अंतिम आदेश में हाईकोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 नागरिकों को अपनी राय व्यक्त करने और गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार देते हैं। कोर्ट ने कहा कि यदि लोग सरकार के निर्णयों से असहमत हैं, तो उन्हें शांतिपूर्ण विरोध का पूरा अधिकार है। इस मामले में पुलिस द्वारा की गई कार्रवाई याचिकाकर्ता के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है, इसलिए निष्कासन आदेश को तत्काल प्रभाव से निरस्त किया जाता है।
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