मुंबई में एनसीपी के नेता बाबा सिद्दीकी की हत्या से पूरे बिहार खासतौर पर गोपालगंज जिले में उनके पैत्रिक गांव मांझा में शोक की लहर दौड़ गई है. गांव में रह रहे उनके परिजनों और रिश्तेदारों के पास लोग कुशलक्षेम पूछने आ रहे हैं. दरअसल बाबा सिद्दीकी भले ही मुंबई में रहते थे, लेकिन उनकी आत्मा यहां गांव में बसती थी. वह यहां के लोगों को आगे बढ़ाने के लिए हर संभव कोशिश करते थे. इसी क्रम में वह अपने पिता अब्दुर रहीम के नाम पर ट्रस्ट बनाकर बिहार में 40 चैरिटेबल संस्थाओं का संचालन कर रहे थे.
इन सभी संस्थाओं में दबे, कुचले और गरीब परिवार के बच्चों को प्रतियोगी परीक्षाओं की कोचिंग कराई जाती थी. इसके अलावा जरूरत मंद लोगों के लिए चिकित्सा एवं अन्य तरह की मदद की व्यवस्था कराई जाती थी. अकेले गोपालगंज में ही इस ट्रस्ट के तहत तीन संस्थाओं का संचालन किया जा रहा है. हालांकि उनके निधन के बाद इस ट्रस्ट और इससे जुड़ी संस्थाओं की व्यवस्था को लेकर सवाल उठने लगे हैं. स्थानीय लोगों के मुताबिक बाबा सिद्दीकी के दो भाई यहां बिजनेस से जुड़े हैं. उम्मीद है कि बाबा सिद्दीकी के बाद उनके भाई ही इन संस्थाओं का संचालन करेंगे.
कोविड के समय बांटी थी राहत सामग्री
ग्रामीणों के मुताबिक कोविड के समय जब पूरा का पूरा देश अपने घरों में कैद हो गया था, बाबा सिद्दीकी के ट्रस्ट ने गांव में बड़े स्तर पर काम किया. बाबा सिद्दीकी की पहल पर बड़ी संख्या में युवा इस ट्रस्ट के जरिए समाज सेवा कार्य से जुड़े. खुद बाबा सिद्दीकी भी उस समय गोपालगंज आए और यहां के लोगों के लिए सैनिटाइजर, मास्क, पीपीई किट सहित अन्य राहत सामग्री का वितरण कराया था. वह मुंबई में रहकर भी हमेशा यहां के लोगों के संपर्क में रहते और यहां के लोगों के सुख दुख में शामिल होने की कोशिश करते थे.
मुंबई रवाना हुए परिजन
ऐसे हालात में रविवार की देर रात मीडिया के जरिए उनकी हत्या की खबर मिली, उनके पैतृक निवास स्थान पर शोक की लहर दौड़ गई. खबर सुनकर लोग उनके घर पहुंचने लगे. रविवार की सुबह से ही चट्टी चौराहों से लेकर बाजारों तक में हर जगह एक ही चर्चा हो रही थी कि बिहार ने अपना लाल खो दिया. इसी के साथ लोग चर्चा कर रहे थे कि बाबा सिद्दीकी द्वारा शुरू कराए गए समाज कल्याण के विभिन्न कामों का अब क्या होगा. बताया जा रहा है कि बाबा सिद्दीकी के रिश्तेदार रविवार की सुबह ही मुंबई के लिए रवाना हुए.
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