बिहार की ‘बराबर की गुफा’, जिस पर बनी हॉलीवुड फिल्म और मिला ऑस्कर अवॉर्ड

बिहार

बिहार, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों से भरपूर राज्य है. इसे एक तरफ जहां क्रांति की धरती कहा जाता है तो वहीं दूसरी तरफ लोकतंत्र की जननी भी माना जाता है. बिहार में ऐतिहासिक स्थलों की कमी नहीं है. इनमें से कई स्थल विश्व स्तर पर प्रसिद्ध हैं, जो भले ही सालों पुराने हों, लेकिन इसका आकर्षण इतना है कि इसके मोहपाश में बंधकर एक विदेशी ने इस पर फिल्म बना दी थी.

राजधानी पटना से करीब 60 किलोमीटर की दूरी पर जहानाबाद जिले में स्थित ‘बराबर की गुफा’ एक ऐसी गुफा है, जो हमेशा से ही आम लोगों के साथ-साथ देसी और विदेशी सैलानियों को अपनी ओर आकर्षित करती रहती है. हर साल लाखों सैलानी इस गुफा को देखने आते हैं और इसकी बनावट को देखकर अचंभित हो जाते हैं. इतिहास के अनुसार, इस गुफा को करीब 2,200 साल पहले सम्राट अशोक ने बनवाया था.

ब्रिटिश लेखक ने लिखा उपन्यास

ब्रिटेन के प्रसिद्ध साहित्यकार ईएम फोर्स्टर ने इस गुफा पर आधारित अपनी पुस्तक ‘ए पैसेज टू इंडिया’ 1924 में लिखी थी. इस उपन्यास में गुफा की छाप स्पष्ट रूप से दिखाई देती है और यह पुस्तक दुनिया भर में मशहूर हो गई थी. इस किताब को विश्व के सर्वश्रेष्ठ 100 उपन्यासों में शामिल किया गया था.

1984 में बनी फिल्म

ईएम फोर्स्टर के उपन्यास ‘ए पैसेज टू इंडिया’ पर 1984 में हॉलीवुड फिल्म बनी. इस फिल्म का निर्देशन डेविड लीन ने किया और इसमें जूडी डेविस, जेम्स फॉक्स, पैगी एशक्रॉफ्ट, एलेक गिनीज और विक्टर बैनर्जी जैसे प्रसिद्ध कलाकारों ने अभिनय किया. इस फिल्म ने न केवल लोकप्रियता हासिल की बल्कि कई पुरस्कार भी जीते.

फिल्म ने जीता था ऑस्कर अवार्ड

इस फिल्म ने न केवल ऑस्कर पुरस्कार जीते, बल्कि 15 अन्य पुरस्कार भी हासिल किए. यह पहला मौका था जब किसी विदेशी फिल्म ने बिहार की ऐतिहासिक धरोहर को विश्व मंच पर प्रस्तुत किया और उसे इतना बड़ा सम्मान मिला. इस फिल्म में गुफा के वास्तविक सेट का निर्माण किया गया और इसे हूबहू बराबर की गुफा की संरचना पर बनाया गया.

साहित्य और फिल्म की दुनिया में बड़े नाम सत्यजीत रे भी इस गुफा से प्रभावित हुए थे. उन्होंने इस गुफा पर आधारित नाटक के निर्माण की योजना बनाई थी, लेकिन यह प्रोजेक्ट कभी पूरा नहीं हो सका.

बराबर की गुफा की विशेषताएं

बराबर की गुफा की लंबाई करीब डेढ़ किलोमीटर है और यह कई गुफाओं का समूह है. यहां स्तूप भी बने हुए हैं, जिनमें साधु और संत ध्यान करते थे. इस गुफा का एक दिलचस्प पहलू यह है कि जब इसमें ‘ओम’ स्वर का उच्चारण किया जाता है तो आवाज पांच मिनट तक गूंजती रहती है.

प्रसिद्ध फिल्म समीक्षक विनोद अनुपम कहते हैं, ‘बिहार की धरोहरें हमेशा से फिल्मकारों को आकर्षित करती रही हैं, लेकिन हमने इन धरोहरों का महत्व और प्रचार सही तरीके से नहीं किया. हमें इन धरोहरों को विश्वभर में पहचान दिलाने की जरूरत है, जैसा कि ‘ए पैसेज टू इंडिया’ ने किया.’

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