पुलिस कर्मचारियों के लिए बड़े खतरे की घंटी! हैरान कर देगी ये Report

पंजाब

चंडीगढ़: ट्रैफिक जाम, हॉर्न का शोर और लगातार बढ़ते वाहनों की संख्या अब सिर्फ आम लोगों के लिए ही नहीं, बल्कि ट्रैफिक पुलिस के स्वास्थ्य के लिए भी खतरा बन गई है। पीजीआई के स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ की एक नई रिसर्च में खुलासा हुआ है कि चंडीगढ़ की ट्रैफिक पुलिस लगातार शोर प्रदूषण की चपेट में है। इसका असर उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर गहराई से पड़ रहा है। इस अध्ययन में 422 पुलिसकर्मियों को शामिल किया गया। इनमें से 100 ट्रैफिक ड्यूटी और 100 दफ्तर में तैनात थे। रिपोर्ट में पाया गया कि 96% ट्रैफिक पुलिसकर्मी रोज़ाना 10 घंटे से ज्यादा समय शोर वाले माहौल में बिताते हैं, जबकि दफ्तर वाले कर्मियों में यह संख्या सिर्फ 69% थी।

अध्ययन के चौंकाने वाले नतीजे:
56% ट्रैफिक पुलिसकर्मियों को कानों में लगातार आवाज़ (टिनिटस) की समस्या है।
ज्यादातर पुलिसकर्मी तनाव, चिड़चिड़ापन, सिरदर्द और नींद की कमी जैसी दिक्कतों से जूझ रहे हैं।
80% से ज्यादा ट्रैफिक पुलिसकर्मी तनावग्रस्त पाए गए।
लगातार शोर के कारण हाई ब्लड प्रेशर और दिल की बीमारियों का खतरा भी बढ़ रहा है।

शहर का शोर स्तर WHO की सीमा से ज्यादा
शहर के 11 प्रमुख ट्रैफिक पॉइंट्स पर आवाज़ का स्तर मापा गया। सबसे ज़्यादा शोर एयरपोर्ट लाइट पॉइंट पर पाया गया (79.9-78.8 डेसिबल), जबकि सबसे कम सुखना लेक एंट्री पॉइंट पर (72.0-69.8 डेसिबल)। औसतन चंडीगढ़ में शोर का स्तर 76 डेसिबल पाया गया, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा तय की गई 65 डेसिबल की सीमा से कहीं अधिक है।

वाहनों की अधिकता बना रही समस्या
रिपोर्ट में बताया गया कि चंडीगढ़ में वाहन घनत्व 4400 वाहन प्रति किलोमीटर है — जो दिल्ली से लगभग दोगुना है। इससे ट्रैफिक जाम और शोर दोनों में बढ़ोतरी हो रही है।डॉ. रवींद्र खैवाल ने कहा कि “ट्रैफिक पुलिस लगातार शोर के बीच काम करती है। यह एक गंभीर व्यावसायिक खतरा है, लेकिन ज़्यादातर कर्मी इसे हल्के में लेते हैं और ईयरप्लग्स जैसी सुरक्षा का इस्तेमाल नहीं करते।”

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