बिहार का मोकामा, जो दशकों से बाहुबली राजनीति का गढ़ रहा है. अब फिर से जातीय गोलबंदी के भंवर में फंस चुका है. मोकामा में जन सुराज पार्टी के नेता दुलारचंद की मौत केवल एक अपराध नहीं, बल्कि जातीय और राजनीतिक समीकरणों की नई शुरुआत भी मानी जा रही है. विधानसभा चुनाव से पहले यह क्षेत्र एक बार फिर से चर्चा में आ गया है.
कांग्रेस नेता अखिलेश सिंह का कहना है कि बिहार की राजनीति में मोकामा हमेशा सुर्खियों में रहा है. चुनाव में मोकामा अपने बाहुबल की वजह से हॉट क्षेत्र रहा है. उन्होंने कहा कि यहां भूमिहार जाति के नेताओं का दबदबा रहा है. यादव जाति के बड़े प्रभाव वाले इस इलाके में भूमिहार जाति ने अपनी दबंग छवि से यहां वर्चस्व कायम किया. उन्होंने कहा कि छोटे सरकार के नाम से मशहूर, अनंत सिंह दो दशक से इस सीट की राजनीति पर हावी रहे हैं. लेकिन दुलारचंद यादव की हत्या ने एकाएक उस संतुलन को हिला दिया है.
दुलारचंद की हत्या से जातीय समीकरण पर असर
दरअसल, कभी लालू यादव के बेहद करीबी रहे दुलारचंद यादव का राजनीतिक सफर कई दलों और समीकरणों से गुजरा, लेकिन उनकी हत्या ने इस बार पूरे मोकामा क्षेत्र में जातीय ध्रुवीकरण को फिर से जगा दिया है. भूमिहार जाति के नेता भी मानते हैं कि इसका असर सिर्फ मोकामा और उसके आसपास नहीं बल्कि पूरे बिहार की सियासी जातीय समीकरण पर पड़ेगा.
यादव और धानुक समुदाय
वहीं जेडीयू नेता नीरज कुमार का कहना है कि अब यादव और धानुक समुदाय के समीकरण इस सत्ता-संतुलन को चुनौती दे रहे हैं. बदले माहौल में यादव समाज आरजेडी के लिए और नाराज दिख रहा है. वहीं परंपरागत रूप से नीतीश कुमार का वोट बैंक धानुक समाज अब जनसुराज प्रत्याशी पीयूष प्रियदर्शी, जो इसी समाज के हैं, इनके साथ गोलबंद हो रहा है. ऐसे में यहीं से मोकामा का सियासी समीकरण भी उलझता हुआ दिख रहा है.
दुलारचंद हत्याकांड के बाद बिहार में 1990 के दशक वाली जातीय गोलबंदी जैसी सियासी तस्वीर भी उभरती हुई दिख रही है. मोकामा को भूमिहारों की राजधानी कहा जाता है, यहां 30 फीसदी से ज्यादा आबादी भूमिहारों की है. यही वजह है कि 1952 से लेकर अभी तक इस सीट पर भूमिहार समाज से आने वाले लोग ही विधानसभा जाते रहे हैं.
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