झारखंड: क्रिश्चियन पर साइलेंट है बीजेपी और सोरेन, किंगमेकर बनाने वालों को क्यों नहीं मिल रहा भाव?

देश

दिसंबर 2019 में जब हेमंत सोरेन गठबंधन को झारखंड में जनादेश मिला, तो सोरेन सबसे पहले रांची के पुरुलिया रोड स्थित कार्डिनल हाउस पहुंचकर आर्च बिशप फेलिक्स टोप्पो से आशीर्वाद लेने पहुंचे. सोरेन के इस कदम की उस वक्त बीजेपी ने आलोचना की थी. पार्टी का कहना था कि यह सरकार मिशनरी के इशारे पर चलने वाली है.

5 साल बाद अब झारखंड का सियासी मिजाज बदला-बदला नजर आ रहा है. इस बार न तो बीजेपी ईसाई की बात कर रही है और न ही हेमंत सोरेन की पार्टी. दिलचस्प बात है कि झारखंड की तीसरी सबसे बड़ी आबादी वाली ईसाई समुदाय भी पूरे चुनाव में साइलेंट हैं.

झारखंड में ईसाई कितने हैं?

2011 जनगणना के मुताबिक, झारखंड में क्रिश्चियन की आबादी करीब 4.3 प्रतिशत के आसपास है. यह हिंदू और मुस्लिम के बाद तीसरी सबसे बड़ी आबादी है. पिछले 13 वर्षों में इस संख्या के बढ़ने की बात कही जा रही है. झारखंड में सिमडेगा, गुमला और खूंटी जिला ईसाई बहुल है.

एक रिपोर्ट्स के मुताबिक, सिमडेगा में करीब 51 प्रतिशत आबादी ईसाईयों की है. झारखंड में दलित और आदिवासी समुदाय के अधिकांश लोग धर्म परिवर्तन कर क्रिश्चियन बने हैं.

ईसाई सियासत में कितने पावरफुल?

झारखंड विधानसभा की करीब 10 प्रतिशत सीटों पर ईसाई समुदाय का दबदबा है. इनमें सिमडेगा की 2, खूंटी की 2 और गुमला की 3 सीटें प्रमुख रूप से शामिल हैं. दिलचस्प बात है कि जिन सीटों पर ईसाई फैक्टर हावी है, वो सभी सीटें आदिवासियों के लिए रिजर्व है.

सिमडेगा और गुमला की 5 सीटों पर तो ईसाई समुदाय ही जीत और हार में बड़ी भूमिका निभाते हैं. 2019 के चुनाव में इन 5 सीटों पर कांग्रेस और जेएमएम ने जीत हासिल की थी.

विधानसभा की 81 सीटों वाली झारखंड में सरकार बनाने के लिए 42 विधायकों की जरूरत होती है. ऐसे में ईसाई बहुल ये 8 सीटें काफी मायने रखती है.

किस तरफ हैं झारखंड के ईसाई?

2014 में जब रघुबर दास के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार बनी तो मिशनरी के खिलाफ सख्ती से कार्रवाई शुरू हुई. रघुबर दास की सरकार ने जहां धर्म परिवर्तन को लेकर सख्त कानून बनाए. वहीं मिशनरी के खिलाफ कई विज्ञापन भी लगवाए.

इस दौरान एजेंसियों ने चर्च और उससे जुड़े संगठनों में छापेमारी और दंडात्मक कार्रवाई भी कराई. इन सब वजहों से 2019 में ईसाई एकजुट होकर इंडिया गठबंधन की ओर चले गए.

2019 के चुनाव में बीजेपी को ईसाईयों के वोट तो जरूर मिले, लेकिन ईसाई बहुल इलाकों में पार्टी बुरी तरह हार गई. क्रिश्चियन समुदाय से ताल्लुक रखने वाले पार्टी के नेता लुईस मरांडी तक अपनी सीट नहीं बचा पाई.

2024 के लोकसभा चुनाव में भी बीजेपी ने ईसाईयों मशीनरी के खिलाफ बिगुल फूंका था और इस चुनाव में भी ईसाई बहुल इलाकों में बीजेपी की हार हो गई थी.

कहा जा रहा है कि इस बार भी अधिकांश क्रिश्चियन समुदाय का सियासी रूझान इंडिया गठबंधन की तरफ ही है. हाल ही में लुईस मरांडी भी बीजेपी छोड़ जेएमएम में आ गई हैं.

ईसाईयों के मुद्दे क्या हैं इस बार?

झारखंड में विधानसभा चुनाव की घोषणा से पहले ईसाई संगठनों ने रांची और गु्मला के अलग-अलगा इलाकों में बैठकें की थी. इस बैठक में धर्मगुरुओं के साथ मिलकर अपने मुद्दों पर चर्चा की. कहा जा रहा है कि इस चुनाव में ईसाईयों के लिए सुरक्षा सबसे बड़ा मुद्दा है.

2014 से लेकर 2019 तक ईसाई के कई धर्मगुरुओं और प्रचारकों को गिरफ्तार किया गया था. इतना ही नहीं, मिशनरीज ऑफ चैरिटी पर इस दौरान बच्चा चोरी का आरोप लगा. मिशनरीज ऑफ चैरिटी में क्रिश्चियन समुदाय की महिलाएं काम करती हैं और उनका पूरा जीवन समुदाय के लिए ही समर्पित रहता है.

हाल ही में ओपन डोर ऑफ वर्ल्ड वॉच नामक संगठन ने एक रिपोर्ट जारी की है. इस रिपोर्ट के मुताबिक ईसाईयों पर हमले के मामले में पूरी दुनिया में भारत का स्थान 11वां है.

राज्यवार बात की जाए तो झारखंड तीसरा सबसे बड़ा राज्य है, जहां ईसाईयों पर सबसे ज्यादा हमले होते हैं.

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