देवघर: एलपीजी की किल्लत अब सिर्फ घरों तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसने उन रसोई तक दस्तक दे दी है जहां से बच्चों के भविष्य की थाली सजती है. झारखंड के देवघर में यह संकट अब एक ऐसी तस्वीर बन चुकी है, जिसे देखकर संवेदनशीलता भी शर्मसार हो जाए.
देवघर जिले के ग्रामीण इलाकों में चल रही मध्याह्न भोजन योजना आज अपने ही बोझ तले कराहती नजर आ रही है. बाघमारी गांव के मध्य विद्यालय में रसोई अब गैस के चूल्हे से नहीं, बल्कि धुएं से भरे पारंपरिक चूल्हों से चल रही है और इसी धुएं में घुल रही है रसोइया दीदियों की सेहत और बच्चों की उम्मीदें.
व्यवस्था की सुस्ती का खामियाजा बच्चे भुगत रहे हैंः रसोइया नूनो देवी
करीब 15 वर्षों से बच्चों के लिए भोजन बना रही नूनो देवी अब गैस के अभाव में मजबूरन चूल्हे का सहारा ले रही हैं. लेकिन यह मजबूरी अब बीमारी में बदलती जा रही है. आंखों में जलन, धुंधलापन और डॉक्टर की सख्त सलाह, ‘धुएं से दूर रहिए’- उनकी रोजमर्रा की हकीकत बन चुकी है. वहीं दूसरी ओर, बच्चों की थाली तक भी इस संकट की आंच पहुंच चुकी है. जो भोजन कभी दोपहर एक बजे मिल जाता था, अब वह दो से तीन बजे के बीच किसी तरह परोसा जा रहा है. भूख और इंतजार के बीच जूझते ये बच्चे व्यवस्था की सुस्ती का सबसे बड़ा खामियाजा भुगत रहे हैं.
जमीनी हकीकत
स्कूल में चूल्हे पर बनते भोजन से उठता धुआं न सिर्फ रसोई तक सीमित है, बल्कि पूरे वातावरण को प्रदूषित बना रहा है. कई बार शिकायतों के बावजूद सिलेंडर की व्यवस्था नहीं हो पाई है. सहयोगी कर्मचारी भी इस लाचारी को स्वीकारते हुए कहते हैं कि प्रशासन तक आवाज पहुंची, लेकिन समाधान अब भी अधर में है.
स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि रसोइया दीदियों ने साफ चेतावनी दे दी है कि अगर जल्द ही गैस सिलेंडर उपलब्ध नहीं कराया गया, तो वे चूल्हे पर खाना बनाने से इनकार कर देंगी, और तब इस योजना की सबसे बड़ी कीमत बच्चों को चुकानी पड़ेगी.
प्रशासनिक पक्ष
विद्यालय के प्रधानाचार्य तुलसी वर्मा का कहना है कि यह समस्या गैस की कमी के कारण उत्पन्न हुई है और इसकी सूचना उच्च अधिकारियों को दे दी गई है. वहीं जिला शिक्षा पदाधिकारी विनोद कुमार ने भी माना कि ग्रामीण क्षेत्रों में गैस की उपलब्धता प्रभावित हुई है और वैकल्पिक उपाय जैसे इंडक्शन आदि पर विचार किया जा रहा है.
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