सुप्रीम कोर्ट ने जयपुर डेवलपमेंट अथॉरिटी (JDA) और पूर्व शाही परिवार की सदस्य तथा राज्य की उपमुख्यमंत्री दीया कुमारी के परिवार के बीच 400 करोड़ रुपये के जमीन विवाद से जुड़ा केस फिर से शुरू कर दिया है. कोर्ट ने राजस्थान हाई कोर्ट के 14 साल पुराने उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें साल 2011 के ट्रायल कोर्ट के फैसले को शाही संपत्ति के पक्ष में “बिना किसी जांच के” सही मान लिया गया था.
जस्टिस जेबी पारदीवाला और केवी विश्वनाथन की बेंच ने कहा कि हाई कोर्ट द्वारा तकनीकी आधार पर JDA की अपील पर विचार नहीं करने का कोई औचित्य नहीं था. जजों ने अपने फैसले में HC बेंच को चार हफ्तों के भीतर JDA की पहली अपील पर मेरिट के आधार पर फैसला करने और एक कंप्लायंस रिपोर्ट जमा करने का निर्देश दिया.
क्या और कहां का है जमीनी मामला
यह विवाद उस जमीन से जुड़ा हुआ है जो आधिकारिक रिकॉर्ड में ‘हथरोई गांव’ हुआ करता था, बाद में यह गांव सेंट्रल जयपुर के शहरी विस्तार का हिस्सा बन गया, जिसमें प्राइम रियल एस्टेट, स्कूल, अस्पताल और अन्य नागरिक इंफ्रास्ट्रक्चर शामिल हैं. जयपुर डेवलपमेंट अथॉरिटी ने अपने राजस्व रिकॉर्ड में “सिवाई चक” (खेती योग्य नहीं सरकारी जमीन) के रूप में दर्ज इस जमीन के टुकड़े की कीमत 400 करोड़ रुपये आंकी है.
कोर्ट में दाखिल याचिका में कहा गया है कि नागरिक प्रशासन ने 1990 के दशक में जमीन पर कब्जा कर लिया था, और पूर्व शाही परिवार के इस दावे को चुनौती दी थी कि इसे 1949 के उस समझौते के तहत प्राइवेट प्रॉपर्टी के रूप में रजिस्टर्ड किया गया था जो जयपुर के भारतीय संघ में विलय से जुड़ा था.
शाही परिवार के पक्ष में सुनाया फैसला
अथॉरिटी का कहना है कि जमीन को कभी भी समझौते की अनुसूची में पूर्व शाही परिवार की प्राइवेट प्रॉपर्टी के रूप में लिस्टेड नहीं किया गया था, जबकि 1993 और 1995 के बीच मुआवजा देकर जमीन के बड़े हिस्से को कानूनी रूप से अधिग्रहित कर लिया गया था.
लेकिन साल 2005 में, शाही परिवार की ओर से मालिकाना हक की घोषणा को लेकर एक मुकदमा (Civil Suit) दायर किया गया. करीब 6 साल बाद 24 नवंबर, 2011 को, ट्रायल कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया, और उन्हें मालिक घोषित कर दिया गया. साथ ही कोर्ट ने राज्य के पक्ष में राजस्व प्रविष्टियों को खारिज कर दिया और अथॉरिटी को कब्जे में दखल देने से रोक दिया.
जमीन को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा JDA
इसके खिलाफ अथॉरिटी ने अगले साल 2012 में अपनी पहली अपील दायर की. लेकिन नवंबर 2023 में इसे खारिज कर दिया गया था, हालांकि एक साल बाद इसे फिर से बहाल कर दिया गया. पिछले साल 15 सितंबर को राजस्थान हाई कोर्ट ने इस जमीनी विवाद में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, और ट्रायल कोर्ट के फैसले को अपीलीय जांच के बिना ही बरकरार रखा.
फैसले को लेकर जयपुर डेवलपमेंट अथॉरिटी ने 10 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, और उसकी ओर से यह तर्क दिया गया कि पब्लिक टाइटल, अधिग्रहण पूरे होने, रेवेन्यू रिकॉर्ड के सेटल होने और आर्टिकल 363 के तहत संवैधानिक रोक से जुड़े मसलों के बावजूद तकनीकी आधार पर सरकारी जमीन चली गई. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो यह अब फिर से खुलने जा रहा है.
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