मैं बिहार से हूं, मेरा बच्चा चल नहीं सकता, एक हादसे के बाद उसका एक पैर काट दिया गया था. मैं घरों में काम करने जाती हूं, बच्चों के साथ अकेले रहती हूं, पति बिहार में रहते हैं. बच्चे की दवाइयां लेने के लिए जामिया नगर के इलाके से सरकारी अस्पताल सफदरजंग जाना पड़ता है. जोकि जामिया नगर से 10 से 13 किलोमीटर दूर है. अस्पताल जाने के लिए मैं हमेशा बस का इस्तेमाल करती हूं. बस में चढ़ जाया करती थी और बस वाला एक गुलाबी रंग का टिकट दे दिया करता था. बिना पैसा खर्च किए अस्पताल पहुंच जाया करती थी. बस के टिकट में जो भी 20 से 40 रुपये बच जाते थे वो मेरे लिए तो बहुत हुआ करता था. आने-जाने के यह पैसे मेरे लिए इतने ज्यादा है कि टिकट के पैसे बचाने के लिए अब मैं पैदल अस्पताल चली जाऊंगी.
ऊपर कहीं गई बाते शहनाज नाम की महिला की है. जो दिल्ली में घरों में काम करती है. 3 घरों में वो काम करती है और हर घर से महीने के 2 से 3 हजार रुपये तक कमा लेती है. सब पैसे मिलाकर भी 10 हजार से ज्यादा वो महीने के नहीं कमा पाती है. इन सब चीजों के बीच दिल्ली में घर का 3 हजार रुपये किराया भी देना है, 2 वक्त का खाना भी खाना है और बच्चे की दवाई का भी खर्चा है. इन सब चीजों के बीच इतनी सी आमदनी में अब बिहार का आधार कार्ड लेकर वो दिल्ली की बस में बेफिक्र होकर फ्री बस सेवा का इस्तेमाल नहीं कर सकेंगी.
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