किसी भी घर पर खाने-पीने की चीजों की बढ़ती कीमतों का असर एक ही बार में नहीं दिखता, बल्कि यह धीरे-धीरे महीने के बजट को प्रभावित करता है। प्याज, खाना पकाने के तेल और दालों की कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण रोजमर्रा का सामान खरीदना महंगा होता जा रहा है। हालांकि, इस बार सभी खाद्य पदार्थों की कीमतों पर एक जैसा असर नहीं पड़ा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, जहां एक तरफ प्याज और अन्य सब्जियों की कीमतों में उतार-चढ़ाव देखा गया, वहीं खाने-पीने की खुदरा महंगाई दर जुलाई के 5.52% से बढ़कर अगस्त में 5.95% और मुख्य खुदरा महंगाई दर 4.45% से बढ़कर 4.82% हो गई है।
🌾 फूड इन्फ्लेशन और मानसून का जोखिम
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अर्थशास्त्रियों का अनुमान: जानकारों और अर्थशास्त्रियों का मानना है कि आने वाले तीन से छह महीनों में खाने-पीने की चीजों की महंगाई बढ़कर 7-8% तक पहुंच सकती है। ICRA और अन्य वित्तीय संस्थाओं का अनुमान है कि सप्लाई और फसल की पैदावार में अनिश्चितता के कारण यह दबाव अक्टूबर और उसके आगे भी बना रह सकता है।
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अल नीनो और मानसून की स्थिति: मौसम से जुड़ा जोखिम सबसे बड़ा कारण माना जा रहा है। सामान्य से कम और असमान मानसून के कारण खरीफ की फसल के साथ-साथ आने वाली रबी फसलों पर भी असर पड़ने की आशंका है। जलाशयों में पानी का स्तर कम होने से सिंचाई प्रभावित हो सकती है।
🛢️ वैश्विक तनाव और सप्लाई चेन का प्रभाव
स्थानीय मौसम के अलावा, पश्चिम एशिया का टकराव और वैश्विक बाजार में कच्चे तेल व ऊर्जा की ऊंची कीमतें भी लॉजिस्टिक्स, ढुलाई, पैकेजिंग और खाद के जरिए कृषि लागत को बढ़ा रही हैं। भारत खाद्य तेलों के आयात पर निर्भर है, जिससे अंतरराष्ट्रीय कीमतों का सीधा असर घरेलू बाजार पर पड़ता है। हालांकि, सरकार और कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आगामी रबी की फसल अच्छी रहती है और सप्लाई बेहतर होती है, तो आने वाले समय में महंगाई के मोर्चे पर कुछ राहत मिल सकती है।
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