आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि यानी सर्वपितृ अमावस्या का सनातन धर्म में अत्यधिक महत्व और विशेष स्थान है। साल 2026 में सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर, शनिवार को मनाई जाएगी। यह पावन दिन अपने पूर्वजों की आत्मशांति, उनकी तृप्ति और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का सबसे उत्तम अवसर माना जाता है। धार्मिक शास्त्रों के अनुसार, इस दिन पूरी श्रद्धा और सही नियमों के साथ किया गया श्राद्ध कर्म सीधा पितरों तक पहुंचता है। यदि आप भी अपने पूर्वजों को प्रसन्न करना चाहते हैं और तर्पण-पूजन की सही विधि जानना चाहते हैं, तो यह लेख आपके लिए बेहद उपयोगी है।
🌅 सर्वपितृ अमावस्या पर पितरों के श्राद्ध की संपूर्ण विधि
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प्रातः स्नान और संकल्प: अमावस्या के दिन सुबह जल्दी उठकर पवित्र स्नान करें, साफ और सात्विक वस्त्र धारण करें तथा हाथ में जल व काले तिल लेकर अपने पूर्वजों के नाम का संकल्प लें।
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तर्पण कर्म: दोपहर के शुभ समय (विशेषकर सुबह 11:45 से दोपहर 03:36 के बीच) दक्षिण दिशा की ओर मुख करके हाथ में कुश और काले तिल लें तथा जल अर्पित करते हुए पितरों का स्मरण करें।
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पंचबलि भोग: घर में भोजन तैयार होने के बाद सबसे पहले देव, गाय, कुत्ते, कौए और चींटियों के लिए भोजन का एक-एक अंश अलग से निकालकर रखें।
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ब्राह्मण भोजन और दान: इसके बाद विद्वान ब्राह्मणों को श्रद्धापूर्वक सात्विक भोजन कराएं और अपनी क्षमता के अनुसार अन्न, वस्त्र या तिल का दान देकर उनका आशीर्वाद प्राप्त करें।
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संध्या दीपक: शाम के समय घर के मुख्य द्वार पर या पीपल के पवित्र वृक्ष के नीचे पितरों के नाम का एक दीपक जलाकर सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें।
🌾 तर्पण और पंचबलि भोग निकालने के जरूरी नियम
श्राद्ध कर्म का सबसे मुख्य और महत्वपूर्ण भाग तर्पण व पंचबलि भोग होता है। दोपहर के समय हाथ में कुश और काले तिल लेकर जल से पितरों को तर्पण देने से वे तृप्त होते हैं। इसके पश्चात जब घर में सात्विक भोजन बन जाए, तो सबसे पहले पंचबलि भोग निकाला जाता है। इसमें देव, गाय, श्वान (कुत्ते), काक (कौए) और पिपीलिका (चींटियों) के लिए भोजन का अंश अलग किया जाता है। इन जीवों को भोजन देने से पितृ अत्यंत संतुष्ट होते हैं। सही नियमों से पंचबलि निकालने से जीवन के सभी कष्ट और बाधाएं दूर होती हैं।
🪔 पितरों की विदाई और संध्या के समय दीपक जलाने के नियम
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शुभ समय: सर्वपितृ अमावस्या की शाम को सूर्यास्त से ठीक पहले घर के मुख्य द्वार पर या पीपल के पेड़ के नीचे पितरों के निमित्त दीपक प्रज्वलित करें।
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दिशा का विशेष ध्यान: दीपक जलाते समय अपना मुख हमेशा दक्षिण दिशा की ओर रखना चाहिए, क्योंकि दक्षिण दिशा को पितरों का स्थान माना गया है।
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क्षमा प्रार्थना और आशीर्वाद: हाथ जोड़कर अपने पूर्वजों से जाने-अनजाने में हुई किसी भी भूल या गलती के लिए क्षमा मांगें और उनके सकुशल गमन की प्रार्थना करें। साथ ही, अपने परिवार में सुख, शांति, सुरक्षा और समृद्धि बनाए रखने के लिए उनका आशीर्वाद लें। इस प्रकार पूर्ण विधि-विधान से दी गई विदाई से पितर अत्यंत प्रसन्न होकर सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।
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