कानपुर देहात: आजादी के 78 साल बाद भी पांडु नदी पर नहीं बन सका स्थायी पुल, जर्जर बांस-लकड़ी के सहारे सांसों का सफर

उत्तर प्रदेश

कानपुर देहात (उत्तर प्रदेश): एक तरफ जहां देश में अत्याधुनिक एक्सप्रेस-वे, नेशनल हाईवे और विशालकाय ओवरब्रिज बिछाकर विकास के नए कीर्तिमान स्थापित करने के दावे किए जा रहे हैं, वहीं उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात जिले का एक गांव आज भी अति-आवश्यक बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहा है।

आजादी के 78 वर्षों के लंबे कालखंड के उपरांत भी रसूलाबाद विकासखंड की ग्राम पंचायत मिर्जापुर लकोठिया अंतर्गत मजरा ‘बंदरहा’ में पांडु नदी पर एक पक्के व स्थायी पुल का निर्माण नहीं हो सका है। नतीजतन, यहां के ग्रामीण अपनी जान हथेली पर रखकर लकड़ी और बांस के टुकड़ों से निर्मित अत्यंत जर्जर अस्थायी पुल के सहारे नदी पार करने को विवश हैं।

🌉 दर्जनों गांवों की हजारों की आबादी जर्जर पुल पर निर्भर, 15 किलोमीटर अतिरिक्त चक्कर लगाने की मजबूरी

प्राप्त जानकारी के अनुसार, यह समस्या मात्र एक गांव की नहीं है; बंदरहा, बकीठिया, लकोठिया, कोला और पछियान पुरवा सहित आसपास के दर्जनों गांवों की हजारों की आबादी की दैनिक जीवनचर्या इसी अस्थायी पुल पर टिकी हुई है।

वर्षों पूर्व ग्रामीणों ने स्वयं चंदा जुटाकर आरसीसी (RCC) के खंभों पर लकड़ी और बांस रखकर यह कामचलाऊ पुल तैयार किया था। समय बीतने के साथ-साथ यह पुल पूरी तरह जर्जर और खोखला हो चुका है, किंतु शासन-प्रशासन और स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया। ग्रामीणों का कहना है कि यदि वे इस खतरनाक पुल का उपयोग न करें, तो उन्हें अपने रोजाना के कार्यों और नजदीकी बाजार तक पहुंचने के लिए करीब 15 किलोमीटर का अतिरिक्त लंबा रास्ता तय करना पड़ता है।

🎒 जान जोखिम में डालकर स्कूल जाते हैं नौनिहाल, कंधे पर बैग टांगकर नदी पार कराते हैं बेबस अभिभावक

इस बदहाली का सबसे दर्दनाक पहलू मासूम स्कूली बच्चों की शिक्षा से जुड़ा है। विशेषकर मानसून और बरसात के दिनों में जब नदी का जलस्तर बढ़ता है, तब यह पुल जानलेवा साबित होता है।

बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंतित अभिभावक प्रतिदिन उन्हें खुद पुल तक छोड़ने आते हैं और छुट्टी के समय वापस पुल के किनारे खड़े होकर उनका इंतजार करते हैं। कई बार तो स्थिति इतनी भयानक हो जाती है कि माता-पिता को अपने बच्चों को गोद में उठाकर और उनके भारी स्कूल बैग अपने कंधों पर लादकर इस कंपकंपाते जर्जर पुल को पार कराना पड़ता है।

🚑 मरीजों और गर्भवती महिलाओं के लिए अग्निपरीक्षा, किसानों को भी फसल बेचने में भारी जोखिम

आपातकालीन स्वास्थ्य परिस्थितियों में यह मार्ग मरीजों, गंभीर रूप से बीमार वृद्धों और गर्भवती महिलाओं के लिए किसी दुःस्वप्न से कम नहीं है।

पुल जर्जर होने के कारण एम्बुलेंस या चार पहिया वाहन गांव तक नहीं पहुंच पाते, जिससे अस्पताल पहुंचने में होने वाली देरी कई बार जानलेवा साबित हो जाती है। इसके अलावा, क्षेत्र के किसान अपनी गाढ़ी कमाई और कृषि उपज को मुख्य मंडी तक ले जाने के लिए हर दिन इसी जोखिम भरे रास्ते का इस्तेमाल करने को मजबूर हैं।

🗳️ “चुनाव जीतते ही वादे भूल जाते हैं नेता”: ग्रामीणों ने जल्द से जल्द पक्का पुल बनाने की उठाई मांग

क्षेत्रीय ग्रामीणों का गंभीर आरोप है कि हर चुनाव के समय राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि और नेता बड़े-बड़े वादे और आश्वासन देकर वोट तो हासिल कर लेते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही गांव की इस विकराल समस्या को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है।

सरकारी विकास के दावों के बीच यह गांव आज भी एक पक्के आरसीसी पुल की बाट जोह रहा है। आक्रोशित और परेशान ग्रामीणों ने उत्तर प्रदेश सरकार व जिला प्रशासन से पुरजोर मांग की है कि पांडु नदी पर शीघ्र से शीघ्र एक मजबूत पक्के पुल का निर्माण कराया जाए, ताकि हजारों निर्दोष ग्रामीणों की जिंदगी रोज-रोज मौत के साये में न रहे।

What do you feel about this post?

0%
like

Like

0%
love

Love

0%
happy

Happy

0%
haha

Haha

0%
sad

Sad

0%
angry

Angry