Gen-Z के ऐतिहासिक आंदोलन के सामने झुकी सरकार, 10 साल की सजा और 10 करोड़ जुर्माने के बाद भी नहीं माने छात्र

देश

2014 में सत्ता में आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह तीसरा कार्यकाल है। उनके कार्यकाल के दौरान किसान आंदोलन से लेकर एंटी सीएए-एनआरसी (CAA-NRC) और एसआईआर (SIR) जैसे कई बड़े आंदोलन हुए हैं। विपक्ष भी विभिन्न मुद्दों पर लगातार आंदोलन करता रहा है—संसद की कार्यवाही बाधित करने से लेकर सड़क तक प्रदर्शन होते रहे हैं, लेकिन नीट पेपर लीक मामले में जेन-जी (Gen-Z) के आंदोलन ने ऐसा रंग दिखाया कि आखिरकार सरकार को झुकना ही पड़ा।

शुक्रवार को सरकार ने परीक्षा में पेपर लीक रोकने के लिए कई कड़े कदम उठाए थे, जिनमें एनटीए (NTA) के 47 अधिकारियों को बर्खास्त करना, एनटीए के ढांचे में सुधार करना, शिक्षा सचिव का तबादला करना, और पेपर लीक पर 10 साल की सजा व 10 करोड़ रुपये के जुर्माने का कड़ा कानून शामिल था। लेकिन इसके बावजूद शनिवार को आंदोलनकारियों की मुख्य मांग स्वीकार करते हुए केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को आखिरकार अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा।

📜 एमजे अकबर के बाद इस्तीफा देने वाले दूसरे मौजूदा केंद्रीय मंत्री बने धर्मेंद्र प्रधान

धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा इसलिए भी बेहद अहम है, क्योंकि 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से वे जनता के दबाव में पद से इस्तीफा देने वाले दूसरे मौजूदा केंद्रीय मंत्री हैं। ओडिशा में जन्मे धर्मेंद्र प्रधान ने पहली बार 2021 में शिक्षा मंत्री का पद संभाला था और 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की जीत के बाद उन्हें फिर से इस पद पर नियुक्त किया गया था।

प्रधान से पहले, 2014 के बाद से जनता के भारी दबाव में सिर्फ एक और मौजूदा केंद्रीय मंत्री ने इस्तीफा दिया था—वे थे पत्रकार से नेता बने एम.जे. अकबर। उस समय विदेश राज्य मंत्री रहे अकबर ने अक्टूबर 2018 में अपना इस्तीफा दिया था। यह फैसला वरिष्ठ पत्रकार प्रिया रमानी द्वारा उन पर लगाए गए यौन उत्पीड़न और गलत व्यवहार के आरोपों के 10 दिन बाद आया था, हालांकि अकबर ने इन आरोपों को खारिज कर दिया था।

⚠️ NEET-UG पेपर लीक और आंदोलन की शुरुआत, 12 छात्रों की आत्महत्या के बाद भड़का आक्रोश

आइए जानें कि ऐसी क्या स्थितियां बनीं, जिनकी वजह से धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। विरोध की शुरुआती वजह 3 मई को आयोजित नीट-यूजी (NEET-UG) मेडिकल प्रवेश परीक्षा का कथित पेपर लीक होना और उसके बाद एग्जाम कैंसिल होने के कारण 21 जून को दोबारा टेस्ट कराया जाना था। परीक्षा रद्द होने और दोबारा टेस्ट के आदेश के बीच, भारी मानसिक तनाव (Stress & Trauma) की वजह से 12 छात्रों ने आत्महत्या कर ली।

इस त्रासदी को लेकर देश में भारी आक्रोश था। इसी बीच 15 मई को एक सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत की ‘कॉकरोच’ वाली टिप्पणी के बाद ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) नाम के राजनीतिक आंदोलन की नींव पड़ी। CJP के बैनर तले 6 जून से देश के अलग-अलग हिस्सों में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की जवाबदेही और इस्तीफे की मांग पर आंदोलन शुरू हो गए। नीट पेपर लीक के साथ-साथ अन्य बोर्ड परीक्षाओं में प्रशासनिक खामियों ने देशभर में विरोध की आग को हवा दी।

🪧 जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन धरना और सोनम वांगचुक का आमरण अनशन

देशभर में बिखरे विरोध प्रदर्शनों के बाद, CJP के बैनर तले छात्र और युवा इकट्ठा हुए और 20 जून से नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया। इस प्रदर्शन ने देश के युवाओं को बड़े पैमाने पर आकर्षित किया और जंतर-मंतर पर भारी भीड़ जुटने लगी।

पर्यावरणविद सोनम वांगचुक, जिन्होंने मई के मध्य में CJP के गठन पर खुद को ‘ऑनररी कॉकरोच’ घोषित किया था, 28 जून को जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए और अनिश्चितकालीन उपवास शुरू कर दिया। 18 जुलाई को पुलिस ने बिगड़ते स्वास्थ्य के कारण सोनम वांगचुक को धरना स्थल से हटाकर सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया। बाद में उनकी पत्नी की याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के बाद 21 जुलाई को उन्हें मेदांता अस्पताल शिफ्ट किया गया। अंततः केंद्रीय मंत्रियों जे.पी. नड्डा और जितेंद्र सिंह से बातचीत के बाद 23 जुलाई की रात उन्होंने अपना अनशन समाप्त किया।

🚔 संसद मार्च पर पुलिस लाठीचार्ज से भड़का गुस्सा, विपक्ष ने सरकार को घेरा

इससे पहले 20 जुलाई को प्रदर्शनकारी छात्रों ने संसद भवन तक मार्च निकालने का प्रयास किया था। संसद मार्च के दौरान पुलिस और सुरक्षा बलों ने छात्रों पर बल प्रयोग और लाठीचार्ज किया। हालांकि, पुलिस ने दावा किया कि प्रदर्शनकारियों की ओर से हुई पत्थरबाजी में करीब 100 पुलिसकर्मी घायल हुए। छात्रों पर हुए इस लाठीचार्ज की पूरे देश में तीखी निंदा हुई और विपक्ष ने इस मुद्दे पर सरकार को चौतरफा घेरना शुरू कर दिया।

CJP की मुख्य मांग राष्ट्रीय परीक्षाओं की शुचिता बनाए रखने में नाकामी और बार-बार हो रहे पेपर लीक के लिए शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा थी। इसके साथ ही वे पीड़ित छात्रों और आत्महत्या करने वाले अभ्यर्थियों के परिवारों के लिए मुआवजे तथा पूरी परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता लाने की मांग कर रहे थे।

👥 Gen-Z के समर्थन में आए नागरिक समाज और राजनीतिक दल, जंतर-मंतर पर मना जश्न

इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं (NEET व अन्य प्रवेश परीक्षाएं) के अभ्यर्थी और ‘Gen-Z’ (युवा पीढ़ी) थे। इसके अलावा, अभिजीत दीपके के आह्वान पर विरोध स्वरूप ‘कॉकरोच’ का बैज लगाने वाले नागरिक, छात्र संगठन, अभिभावक और सिविल सोसाइटी के लोग भी एकजुटता में खड़े हुए।

शुरुआत में सरकार का रुख काफी सख्त था। पुलिस लाठीचार्ज और कथित पेलेट गन के इस्तेमाल (जिसका पुलिस ने खंडन किया) के चलते माहौल काफी गरमा गया था। हफ्तों की चुप्पी के बाद आखिरकार पीएम मोदी ने फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने और अपराधियों को सख्त सजा देने का ऐलान किया। केंद्र सरकार द्वारा कई कदम उठाए जाने के बाद भी Gen-Z अपनी मूल मांग (शिक्षा मंत्री के इस्तीफे) पर अड़े रहे। अंततः सरकार को झुकना पड़ा और धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया। जैसे ही जंतर-मंतर पर इस्तीफे की खबर पहुंची, CJP समर्थकों और छात्रों में खुशी की लहर दौड़ गई और वे ढोल-नगाड़ों के साथ जश्न मनाते नजर आए।

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